Wednesday, December 30, 2015

हरिः ॐ तत्सत्! शुभमध्याह्नम्।
सर्वेभ्यो भक्तेभ्यो देवभाषारसरसिकेभ्यश्च।🙏
🌺सच्चर्चा🌺
💥आज मानव अशान्त क्यों है?
💥अध्यात्मचर्चा धर्मचर्चा और सच्चर्चा में उसकी वाह्यप्रकृति केवल वाणी-विलासता और अपनी श्रेष्ठता को सिद्ध करने में समुत्साहित है।
💥भगवद्भजन की प्रियता से परे भौतिकता में रमण कर रहा व्यक्ति अध्यात्ममकरन्द का रसास्वादन करना चाहता है।
कपोल-कल्पित विचारधाराओं की विविधता में उलझ कर दिशा विहीन होकर स्वयं तो अन्धकूप में गिर रहा है और साथ में औरों को भी गिरा रहा है।
💥"वस्तु कहीं ढूढ़ें कहीं, केहि विधि आवै हाथ।
कहत कबीर तब पाइए, जब भेदी लीन्हा साथ॥ "
🙏पूज्यपाद भगवान् शङ्कराचार्यमहाभाग कहते हैं-
" शब्दजालं महारण्यं चित्तभ्रमणकारणम्"
💥यह शब्दों का जाल तो घनघोर जंगल की तरह हमारे चित्त को भटका देता है।

" राम अतर्क्य बुद्धि मन बानी।
मत हमार अस सुनहिं सयानी॥

भगवद्भक्तिरसानुभूति में श्रद्धा-विश्वास परमावश्यक है।

"श्रद्धा-विश्वासरूपिणौ"

अाज कल सत्संग से विमुख भौतिकता में रमें तथाकथित  लोग घर बैठे-बैठे, बडी-बड़ी दार्शनिक पुस्तकों को पढ़कर, ज्ञानसम्राट की उपाधि से स्वयं को विभूषित कर, सनातन-धर्मशास्त्रों अौर उसके मान-बिन्दुअों का शास्त्रप्रतिकूल भौतिकबुद्धि के अवलम्बन से खण्डन-मण्डन करके समाज में वाह-वाही लूटते हैं।
ऐसे मूढ यह नहीं जानते, जिस विशाल वट वृक्ष की शीतल छाया में बैठे हैं, वे उसी की जड़ को काटने का असफल प्रयास कर रहे हैं।
🙏निवेदन - हम सभी भगवत्प्रेमी साधुसेवी सनातनी और आध्यात्मिक लोग, ऐसे लोगों से सावधान और सतर्क रहते हुए, अपने धर्म और धर्मशास्त्र के मान-बिन्दुअों के प्रति निरन्तर जागरूक रहें।

🌺सत्य सनातन धर्म की जय🌺

गायत्री मंत्र की खास बातें और चमत्कारी उपाय...
बहुत कम लोग जानते हैं गायत्री मंत्र की खास बातें और
चमत्कारी उपाय...
मंत्र जप ऐसा उपाय है जिससे किसी भी प्रकार
की समस्या को दूरकिया जा सकता है। मंत्रों की शक्ति से
सभी भलीभांति परिचित हैं।
मनचाही वस्तु प्राप्ति और इच्छा पूर्ति के लिए मंत्र जप से अधिक
अच्छा साधन कोई और नहीं है। सभी मंत्रों में गायत्री मंत्र सबसे
दिव्य और चमत्कारी है। इस जप से बहुत जल्द परिणाम प्राप्त
हो जाते हैं। यहां जानिए मंत्र से जुड़ी खास बातें और
चमत्कारी उपाय...
गायत्री मंत्र विद्या का प्रयोग भगवान की भक्ति, ब्रह्मज्ञान
प्राप्ति, दैवीय कृपा प्राप्त करने के साथ ही सांसारिक एवं भौतिक
सुख-सुविधाओं, धन प्राप्त करने की इच्छा के लिए
भी किया जा सकता है।
ये है गायत्री मंत्र:- ऊँ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण् यं
भर्गो देवस्य
धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।
शास्त्रों के अनुसार गायत्री मंत्र को वेदों को सर्वश्रेष्ठ मंत्र
बताया गया है। इस मंत्र जप के लिए तीन समय बताए गए हैं।
इन तीन समय को संध्याकाल भी कहा जाता हैं।
गायत्री मंत्र का जप का पहला समय है
प्रात:काल, सूर्योदय से थोड़ी देर पहले मंत्र जप शुरू
किया जाना चाहिए।
जप सूर्योदय के पश्चात तक करना चाहिए। मंत्र जप के लिए
दूसरा समय है दोपहर मध्यान्ह का। दोपहर में भी इस मंत्र का जप
किया जाता है। इसके बाद तीसरा समय है शाम को सूर्यास्त के
कुछ
देर पहले मंत्र जप शुरू करके सूर्यास्त के कुछ देर बाद
तक जपकरना चाहिए। इन तीन समय के अतिरिक्त
यदि गायत्री मंत्र का जपकरना हो तो मौन रहकर या मानसिक रूप
से जप करना चाहिए। मंत्र जपअधिक तेज आवाज में
नहीं करना चाहिए। गायत्री मंत्र का अर्थ:
सृष्टिकर्ता प्रकाशमान परामात्मा के तेज का हम
ध्यान करते है, वह परमात्मा का तेज हमारी बुद्धि को सद्मार्ग
की ओर
चलने के लिए प्रेरित करें।
शास्त्रों में इसके जाप की विधि विस्तृत रूप से दी गई हैं। इस मंत्र
को जाप
करने के लिए रुद्राक्ष की माला का प्रयोग करना श्रेष्ठ
होता है। इस मंत्र के जप से हमें यह लाभ प्राप्त होते हैं...
उत्साह एवं सकारात्मकता, त्वचा में चमक आती है, तामसिकता से
घृणा होती है, परमार्थ में रूचि जागती है, पूर्वाभास होने लगता है,
आर्शीवाद
देने की शक्ति बढ़ती है, नेत्रों में तेज आता है, स्वप्र सिद्धि प्राप्त
होती है,
क्रोध शांत होता है, ज्ञान की वृद्धि होती है।
विद्यार्थीयों के लिए-
गायत्री मंत्र का जप सभी के लिए उपयोगी है किंतु
विद्यार्थियों के लिए
तो यह मंत्र बहुत लाभदायक है। रोजाना इस मंत्र का एक सौ आठ
बार जप
करने से विद्यार्थी को सभी प्रकार की विद्या प्राप्त करने
मेंआसानी होती है। विद्यार्थियों को पढऩे में मन नहीं लगना, याद
किया हुआ भूल जाना, शीघ्रता से याद न होना आदि समस्याओं से निजात
मिल जाती है।
दरिद्रता के नाश के लिए-
यदि किसी व्यक्ति के व्यापार, नौकरी में हानि हो रही है या कार्य
में सफलता नहीं मिलती, आमदनी कम है तथा व्यय अधिक है तो उन्हें
गायत्री मंत्र का जप काफी फायदा पहुंचाता है। शुक्रवार
को पीले वस्त्र पहनकर हाथी पर विराजमान गायत्री माता का ध्यान
कर गायत्री मंत्र के आगे और पीछे श्रीं सम्पुट लगाकर जप
करने से दरिद्रता का नाश होता है। इसके साथ ही रविवार को व्रत
किया जाए तो ज्यादा लाभ होता है।
संतान संबंधी परेशानियां दूर करने के लिए...
किसी दंपत्ति को संतान प्राप्त करने में कठिनाई आ रही हो या संतान
से
दुखी हो अथवा संतान रोगग्रस्त हो तो प्रात: पति-पत्नी एक साथ
सफेद
वस्त्र धारण कर यौं बीज मंत्र का सम्पुट लगाकर
गायत्री मंत्र का जप
करें। संतान संबंधी किसी भी समस्या से शीघ्र
मुक्ति मिलती है।
शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने के लिए... यदि कोई
व्यक्ति शत्रुओं के कारण परेशानियां झेल रहा हो तो उसे प्रतिदिन
या विशेषकर मंगलवार, अमावस्या अथवा रविवार को लाल वस्त्र पहनकर
माता दुर्गा का ध्यान करते हुए गायत्री मंत्र के आगे एवं
पीछे क्लीं बीज
मंत्र का तीन बार सम्पुट लगाकार एक सौ आठ बार जाप करने
से शत्रुओं
पर विजय प्राप्त होती है। मित्रों में सद्भाव, परिवार में एकता होती है
तथा न्यायालयों आदि कार्यों में भी विजय प्राप्त होती है।
विवाह कार्य में देरी हो रही हो तो...
यदि किसी भी जातक के विवाह में अनावश्यक देरी हो रही हो तो सोमवार
को सुबह के समय पीले वस्त्र धारण कर माता पार्वती का ध्यान
करते हुए
ह्रीं बीज मंत्र का सम्पुट लगाकर एक सौ आठ बार जाप करने
से विवाह
कार्य में आने वाली समस्त बाधाएं दूर होती हैं। यह
साधना स्त्री पुरुष
दोनों कर सकते हैं।
यदि किसी रोग के कारण परेशानियां हो तो...
यदि किसी रोग से परेशान है और रोग से मुक्ति जल्दी चाहते
हैंतो किसी भी शुभ मुहूर्त में एक कांसे के पात्र में स्वच्छ
जल भरकर रख लें एवं उसके सामने लाल आसन पर बैठकर
गायत्री मंत्र के साथ ऐं
ह्रीं क्लीं का संपुट लगाकर गायत्री मंत्र का जप करें।
जप के पश्चात जल
से भरे पात्र का सेवन करने से गंभीर से गंभीर रोग का नाश
होता है। यही जल किसी अन्य रोगी को पीने देने से उसके भी रोग
का नाश होता हैं।
जो भी व्यक्ति जीवन की समस्याओं से बहुत त्रस्त है यदि वह
यह उपाय
करें तो उसकी समस्याएं समाप्त हो जाएंगी। उपाय इस प्रकार
है पीपल,
शमी, वट, गूलर, पाकर की समिधाएं लेकर एक पात्र में
कच्चा दूध भरकर
रख लें एवं उस दूध के सामने एक हजार गायत्री मंत्र का जाप
करें। इसके
बाद एक-एक समिधा को दूध में छुआकर गायत्री मंत्र का जप
करते हुए
अग्रि में होम करने से समस्त परेशानियों एवं दरिद्रता से
मुक्ति मिल जाती है। किसी भी शुभ मुहूर्त में दूध, दही,
घी एवं शहद को मिलाकर एक हजार
गायत्री मंत्रों के साथ हवन करने से चेचक, आंखों के रोग
एवं पेट के रोग
समाप्त हो जाते हैं। इसमें समिधाएं पीपल की होना चाहिए।
गायत्री मंत्रों के
साथ नारियल का बुरा एवं घी का हवन करने से शत्रुओं
का नाश होता है ।
श्रीगायत्री-मन्त्र से रोग-ग्रह-शान्ति
१॰ क्रूर से क्रूर ग्रह-शान्ति में, शमी-वृक्ष
की लकड़ी के छोटे-छोटे टुकड़े कर,
गूलर-पाकर-पीपर-बरगद की समिधा के
साथ ‘गायत्री-मन्त्र से १०८ आहुतियाँ देने से
शान्ति मिलती है।
२॰ महान प्राण-संकट में कण्ठ-भर या जाँघ-भर जल में खड़े
होकर नित्य १०८ बार गायत्री मन्त्र जपने से
प्राण-रक्षा होती है।
३॰ घर के आँगन में चतुस्र यन्त्र बनाकर १ हजार बार
गायत्री मन्त्र का जप कर यन्त्र के
बीचो-बीच भूमि में शूल गाड़ने से भूत-
पिशाच से रक्षा होती है।
४॰ शनिवार को पीपल के वृक्ष के नीचे
गायत्री मन्त्र जपने से सभी प्रकार
की ग्रह-बाधा से रक्षा होती है।
५॰ ‘गुरुचि’ के छोटे-छोटे टुकड़े कर गो-दुग्ध में डुबोकर नित्य १०८
बार गायत्री मन्त्र पढ़कर हवन करने से ‘मृत्यु-
योग’ का निवारण होता है। यह मृत्युंजय-हवन’ है।
६॰ आम के पत्तों को गो-दुग्ध में डुबोकर ‘हवन’ करने से
सभी प्रकार के ज्वर में लाभ होता है।
७॰ मीठा वच, गो-दुग्ध में मिलाकर हवन करने से
‘राज-रोग’ नष्ट होता है।
८॰ शंख-पुष्पी के पुष्पों से हवन करने से कुष्ठ-
रोग का निवारण होता है।
९॰ गूलर की लकड़ी और फल से नित्य
१०८ बार हवन करने से ‘उन्माद-रोग’ का निवारण होता है।
१०॰ ईख के रस में मधु मिलाकर हवन करने से ‘मधुमेह-रोग’
में लाभ होता है।
११॰ गाय के दही, दूध व घी से हवन
करने से ‘बवासीर-रोग’ में लाभ होता है।
१२॰ बेंत की लकड़ी से हवन करने से
विद्युत्पात और राष्ट्र-विप्लव की बाधाएँ दुर
होती हैं।
१३॰ कुछ दिन नित्य १०८ बार गायत्री मन्त्र जपने
के बाद जिस तरफ मिट्टी का ढेला फेंका जाएगा, उस
तरफ से शत्रु, वायु, अग्नि-दोष दूर हो जाएगा।
१४॰ दुःखी होकर, आर्त्त भाव से मन्त्र जप कर
कुशा पर फूँक मार कर शरीर का स्पर्श करने से
सभी प्रकार के रोग, विष, भूत-भय नष्ट हो जाते
हैं।
१५॰ १०८ बार गायत्री मन्त्र का जप कर जल
का फूँक लगाने से भूतादि-दोष दूर होता है।
१६॰ गायत्री जपते हुए फूल का हवन करने से
सर्व-सुख-प्राप्ति होती है।
१७॰ लाल कमल या चमेली फुल एवं शालि चावल से
हवन करने से लक्ष्मी-प्राप्ति
होती है।
१८॰ बिल्व -पुष्प, फल, घी, खीर
की हवन-सामग्री बनाकर बेल के छोटे-
छोटे टुकड़े कर, बिल्व की लकड़ी से
हवन करने से भी लक्ष्मी-प्राप्ति
होती है।
१९॰ शमी की लकड़ी में गो-
घृत, जौ, गो-दुग्ध मिलाकर १०८ बार एक सप्ताह तक हवन
करने से अकाल-मृत्यु योग दूर होता है।
२०॰ दूध-मधु-गाय के घी से ७ दिन तक १०८ बार
हवन करने से अकाल-मृत्यु योग दूर होता है।
२१॰ बरगद की समिधा में बरगद
की हरी टहनी पर गो-घृत,
गो-दुग्ध से बनी खीर रखकर ७ दिन
तक १०८ बार हवन करने से अकाल-मृत्यु योग दूर होता है।
२२॰ दिन-रात उपवास करते गुए गायत्री मन्त्र जप
से यम पाश से मुक्ति मिलती है।
२३॰ मदार की लकड़ी में मदार का कोमल
पत्र व गो-घृत मिलाकर हवन करने से विजय-
प्राप्ति होती है।
२४॰ अपामार्ग, गाय का घी मिलाकर हवन करने से
दमा रोग का निवारण होता है।
विशेषः- प्रयोग करने से पहले कुछ दिन नित्य १००८ या १०८ बार
गायत्री मन्त्र का जप व हवन करना चाहिए

🌹🌹""सुविचार""🌹🌹

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""किसी ने आपको आदर से बुलाया और किसी ने दुत्कार दिया ये दोनों शब्द ही है | इससे कुछ भी बनता-बिगता नहीं है | किसी ने पाँच सम्मान की बात कह दी और किसी ने पाँच गाली दे दी | यदपि गाली देने वालेने अपनी हानि अवश्य की | पर यदि आपके मन में मानापमान की भावना न हो, तो आपका उससे कुछ नहीं बिगड़ा | किन्तु हम लोगो ने एक कल्पना कर ली | जगत में हमारी कितनी अप्रतिष्ठा हो गई, कितने हम अपदस्थ हो गए - हमे नित्य बड़ा भारी डर लगता है | जरा सी निन्दा होने लगती है , तो हम डर जाते है, काँप उठते है | पर भगवान यदि जानते है की निंदा से ही इसका गर्व-ज्वर उतर सकेगा तो वे चतुर चिकित्सक के द्वारा कडवी दवा दी जाने की भाँती उसकी निंदा करा देते है | निंदा,अपमान, अकीर्ति, तिरिस्कार, अप्रतिष्ठा तथा लान्छन आदि अवसरों पर यदि हम भगवान की कृपा मान ले, तो कृपा तो वह है ही, पर हमे तो अवकाश ही नहीं है की हम इस पर विचार भी कर सके | जब तक सफलता है, तब तक मिथ्या आदर है, पर हम मानते है ‘हमे अवकाश कहा है, कितना काम है, हमारे बहुत-से प्रिय सम्बन्धी हैं, कितने मित्र है, कितने बंधू-बान्धव है,कहीं पार्टी है, कही मीटिंग है,कही खेल है, कही कुछ है | सबलोग मुझे बुलाते है, वहाँ हमे जाना ही है | क्या करे |’ इत्यादि | पर भगवान तनिक-सी कृपा कर दे, लोगों के मन में यह बात आ जाय की इसके बुलाने से बदनामी होगी तो आज सब बुलाना बंद कर दे | मुँह से बोलने में भी सकुचाने लगे | भगवान ने तनिक-सा उपाय कर दिया की बस, अवकाश-ही-अवकाश मिलने लगा |

संत कबीर को इसी प्रकार लोगो ने बुलाना छोड़ दिया था | पास बैठने से निन्दा हो जाएगी, इतना जानते ही लोग पास बैठना छोड़ देंगे | संसार तो वही रहता है, जहाँ कुछ पाने की आशा रहती है | वह पाने की वस्तु चाहे प्रशंसा ही क्यों न हो जहाँ पाना नहीं, वहाँ संसार क्यों जायेगा, फिर तो लोग दूर ही रहेंगे |
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सर्वेभ्यो भू देवेभ्यो नमो नम: 🌷🙏🌷सुप्रभातम्🌅
विज्ञानं यज्ञं तनुते। कर्माणि तनुतेऽपि च।
विज्ञानं देवाः सर्वे।
ब्रह्म ज्येष्ठमुपासते। विज्ञानं ब्रह्म चेद्वेद।
तस्माच्चेन्न प्रमाद्यति। शरीरे पाप्मनो हित्वा।
सर्वान्कामान्समश्नुत इति। तस्यैष एव शारीर आत्मा।
यः पूर्वस्य। तस्माद्वा एतस्माद्विज्ञानमयात्।
अन्योऽन्तर आत्माऽऽनन्दमयः। तेनैष पूर्णः।
स वा एष पुरुषविध एव। तस्य पुरुषविधताम्।
अन्वयं पुरुषविधः। तस्य प्रियमेव शिरः। मोदो दक्षिणः पक्षः।
प्रमोद उत्तरः पक्षः। आनन्द आत्मा। ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा।
तदप्येष श्लोको भवति॥🌷🙏🌷

तट कै कौन भरोसा जब हर लहर छुये ढहि जाय,
खोलइ कौन झरोखा जब सगरौ अँधियार लखाय।

पग दुइ पग तौ रेत लगै औ दूरि लगै जस पानी,
बुद्धि मृगा कै हरि कै लइगै तिस्ना भई सयानी,
दृग कै कौन भरोसा जब रेती कन नीर लखाय।
खोलइ कौन झरोखा जब सगरौ अँधियार लखाय।

आग लगै घर के दियना से धुवइँ धुआँ चहुँ ओर,
गिन गिन काटौ रैन अँधेरिया तबहुँ न जागै भोर,
पथ कै कौन भरोसा जब हर पग पै पग बिछलाय।
खोलइ कौन झरोखा जब सगरौ अँधियार लखाय।

अँधियरिया हम बियहि के लाये पाहुन लागि अँजोरिया,
तुहुँका बिपति बिपति यस होये हमैं पियारि बिपतिया,
सुख कै कवन भरोसा जब कुसमय देखे कतराय।
खोलइ कौन झरोखा जब सगरौ अँधियार लखाय।

मन्यते वै पापकारी न कश्चित् पश्यतीति माम् ।
तांश्च   देवा   प्रपश्यन्ति   तथा   ह्यन्तरपूरुष ।।
        अर्थात् पाप करने वाला व्यक्ति यह समझता है कि कोई मुझे नहीं देख रहा है, किंतु देवता एवं उसकी अन्तरात्मा दोनों ही उसे देखरहे होते हैं।
पं. जगदीश प्रसाद द्विवेदी(धर्मार्थ. ):
        ज्ञान का अभिमान होता है पर अभिमान का ज्ञान नहीं होता. पात्र और कुपात्र में इतना ही फर्क है – गाय घास खाकर भी दूध देती है और सांप दूध पीकर भी जहर देता है.

अक्सर युवा सोचता है कि बिना कुछ
किए
ही उसे वह सबकुछ मिल जाए जो वह चाहता है। इस पर लगातार बहस हो रही है कि भाग्य बड़ा है या कर्म। क्या कुंडली देखकर हम अपना कर्म करें, क्या ग्रह की दशा देखकर यह फैसला लें कि हमें कौनसा कदम कब उठाना है?
अनंतकाल से इस विषय पर बहस चली आ रही है कि कर्म महत्वपूर्ण है या भाग्य। जीवन में अगर आपको कुछ पाना है तो मेहनत तो करनी ही पड़ेगी। मंजिलें उन्हीं को मिलती है जो उसकी ओर कदम बढ़ाते हैं।
महाभारत में जब अर्जुन ने कुरुक्षेत्र में युद्ध में अपने स्वजनों को अपने सामने खड़ा पाया तो उसका ‍शरीर निस्तेज हो गया। हाथों से धनुष छूट गया। प्राणहीन मनुष्य के समान वह धरती पर गिर गया। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उसे गीता के कर्म ज्ञान का उपदेश दिया।
भगवान कृष्ण ने अर्जुन को कहा कि राज्य तुम्हारे भाग्य में है या नहीं यह तो बाद में, पहले तुम्हें युद्ध तो लड़ना पड़ेगा। तुम्हें अपना कर्म तो करना पड़ेगा अर्थात स्वजनों के खिलाफ युद्ध तो लड़ना पड़ेगा। तुलसीदासजी ने भी श्रीरामचरित मानस में लिखा है- 'कर्म प्रधान विश्व करि राखा'। अर्थात युग तो कर्म का है।
इसका अर्थ यह हुआ कि हम अपना कार्य करें, फल ‍की चिंता बाद में करें। किसान जब खेत में बीज बोता है तो उसे यह नहीं पता होता कि बारिश होगी या नहीं। जमीन में से बीज से अंकुर फूटेगा या नहीं। अगर पौधे आ भी गए तो उस पर फल आएंगे या नहीं। लेकिन किसान बीजों को जमीन बोता है और फसल की चिंता ईश्वर पर छोड़ देता है।
भाग्य का समर्थन करने वाले कहते है कि हमें जो सुख, संपत्ति, वैभव प्राप्त होता है वह भाग्य से होता है। जैसे लालूप्रसाद यादव की पत्नी राबड़ीदेवी बिहार की मुख्यमंत्री बनीं तो यह उनकी किस्मत थी। डॉ. मनमोहनसिंह भारत के प्रधानमंत्री बने तो उनकी कुंडली में राजयोग था। अगर ‍किसी अभिनेता का बेटा अभिनेता बनता है तो यह उसका भाग्य रहता है कि वह ‍अभिनेता के यहां पैदा हुआ।
जब चार लोग एक समान बुद्धि और ज्ञान रखने वाले एक ही समान कार्य को करें और उनमें से सिर्फ दो को ही सफलता मिले तो हम इसे क्या कहेंगे। दो लोगों के साथ भाग्य साथ नहीं था। ऐसा एक उदाहरण हम यह दे सकते हैं दो व्यक्ति एक साथ लॉटरी का टिकट खरीदते हैं पर लगती लॉटरी एक ही व्यक्ति की है। जब दोनों ने लॉटरी खरीदने का कर्म एक साथ किया तो फल अलग-अलग क्यों?
अंत में यही कहा जा सकता है कि भाग्य भी उन लोगों का साथ देता है जो कर्म करते हैं। किसी खुरदरे पत्थर को चिकना बनाने के लिए हमें उसे रोज घिसना पड़ेगा। ऐसा ही जिंदगी में समझें हम जिस भी क्षेत्र में हों, स्तर पर हों हम अपना कर्म करते रहें बिना फल की चिंता किए। जैसे परीक्षा देने वाले विद्यार्थी परीक्षा देने के बाद उसके परिणाम का इंतजार करते हैं।
यह अंतहीन बहस है कि भाग्य बड़ा है या कर्म। इसके बारे में सबके पास अपने अपने तर्क हैं, लेकिन हर हाल में हमें सकारात्मक सोच के साथ जीवन में कुछ उल्लेखनीय करने के लिए प्रेरणा लेनी चाहिए।