Friday, January 20, 2017

सहेली सुनु सोहिलो रे राग जैतश्री

सहेली सुनु सोहिलो रे राग जैतश्री

सहेली सुनु सोहिलो रे |
सोहिलो, सोहिलो, सोहिलो, सोहिलो सब जग आज |
पूत सपूत कौसिला जायो, अचल भयो कुल-राज ||
चैत चारु नौमी तिथि सितपख, मध्य-गगन-गत भानु |
नखत जोग ग्रह लगन भले दिन मङ्गल-मोद-निधान ||
ब्योम, पवन, पावक, जल, थल, दिसि दसहु सुमङ्गल-मूल|
सुर दुन्दुभी बजावहिं, गावहिं, हरषहिं, बरषहिं फूल ||
भूपति-सदन सोहिलो सुनि बाजैं गहगहे निसान |
जहँ-तहँ सजहिं कलस धुज चामर तोरन केतु बितान ||
सीञ्चि सुगन्ध रचैं चौकें गृह-आँगन गली-बजार |
दल फल फूल दूब दधि रोचन, घर-घर मङ्गलचार ||
सुनि सानन्द उठे दसस्यन्दन सकल समाज समेत |
लिये बोलि गुर-सचिव-भूमिसुर, प्रमुदित चले निकेत ||
जातकरम करि, पूजि पितर-सुर, दिये महिदेवन दान |
तेहि औसर सुत तीनि प्रगट भए मङ्गल, मुद, कल्यान ||
आनँद महँ आनन्द अवध, आनन्द बधावन होइ |
उपमा कहौं चारि फलकी, मोहिं भलो न कहै कबि कोइ ||
सजि आरती बिचित्र थारकर जूथ-जूथ बरनारि |
गावत चलीं बधावन लै लै निज-निज कुल अनुहारि ||
असही दुसही मरहु मनहि मन, बैरिन बढ़हु बिषाद |
नृपसुत चारि चारु चिरजीवहु सङ्कर-गौरि-प्रसाद ||
लै लै ढोव प्रजा प्रमुदित चले भाँति-भाँति भरि भार |
करहिं गान करि आन रायकी, नाचहिं राजदुवार ||
गज, रथ, बाजि, बाहिनी, बाहन सबनि सँवारे साज|
जनु रतिपति ऋतुपति कोसलपुर बिहरत सहित समाज ||
घण्टा-घण्टि, पखाउज-आउज, झाँझ, बेनु डफ-तार |
नूपुर धुनि, मञ्जीर मनोहर, कर कङ्कन-झनकार ||
नृत्य करहिं नट-नटी, नारि-नर अपने-अपने रङ्ग |
मनहुँ मदन-रति बिबिध बेष धरि नटत सुदेस सुढङ्ग ||
उघटहिं छन्द-प्रबन्ध, गीत-पद, राग-तान-बन्धान |
सुनि किन्नर गन्धरब सराहत, बिथके हैं, बिबुध-बिमान ||
कुङ्कुम-अगर-अरगजा छिरकहिं, भरहिं गुलाल-अबीर |
नभ प्रसून झरि, पुरी कोलाहल, भै मन भावति भीर ||
बड़ी बयस बिधि भयो दाहिनो सुर-गुर-आसिरबाद |
दसरथ-सुकृत-सुधासागर सब उमगे हैं तजि मरजाद ||
बाह्मण बेद, बन्दि बिरदावलि, जय-धुनि, मङ्गल-गान |
निकसत पैठत लोग परसपर बोलत लगि लगि कान ||
बारहिं मुकुता-रतन राजमहिषि पुर-सुमुखि समान |
बगरे नगर निछावरि मनिगन जनु जुवारि-जव-धान ||
कीन्हि बेदबिधि लोकरीति नृप, मन्दिर परम हुलास |
कौसल्या, कैकयी, सुमित्रा, रहस-बिबस रनिवास ||
रानिन दिए बसन-मनि-भूषन, राजा सहन-भँडार |
मागध-सूत-भाट-नट-जाचक जहँ तहँ करहिं कबार ||
बिप्रबधू सनमानि सुआसिनि, जन-पुरजन पहिराइ |
सनमाने अवनीस, असीसत ईस-रमेस मनाइ ||
अष्टसिद्धि, नवनिद्धि, भूति सब भूपति भवन कमाहिं |
समौ-समाज राज दसरथको लोकप सकल सिहाहिं ||
को कहि सकै अवधबासिनको प्रेम-प्रमोद-उछाह |
सारद सेस-गनेस-गिरीसहिं अगम निगम अवगाह ||
सिव-बिरञ्चि-मुनि-सिद्ध प्रसंसत, बड़े भूप के भाग |
तुलसिदास प्रभु सोहिलो गावत उमगि-उमगि अनुराग ||

हरि ॐ तत्सत्! सुप्रभातम्।

हरि ॐ तत्सत्!  सुप्रभातम्।
मदीयं सौभाग्यं स्यात्। यत्पुनः अस्मिन्  पवित्रगणे सेवप्रदानं  कर्तुम्  अवसरः  प्राप्तः। नमस्सर्वेभ्यः।🙏�🌺🙏

भगवदनुग्रहात्सर्वे  सत्परुषाः  सत्कर्म कुर्वन्तः  स्व-मानवजीवनं  सार्थकं  कुर्वन्तु।

श्रीमद्भगवतेSपि  वर्णितम् --

*अहो  अमीषां  किमकारि शोभनं  प्रसन्न एषां  स्विदुत स्वयं  हरिः ।*
*यैर्जन्म लब्धं  नृषु भारताजिरे  मुकुन्दसेवौपयिकं  स्पृहा  हि  नः ॥*
(५/११/२१)

देवाः  प्रमुदितमनसा  गायन्ति- अहो , एते भूलोकनिवासिनः  मनुष्याः  सौभाग्यशालिनः सन्ति, ये सर्वे भगवत्कृपापात्राः प्रतीयन्ते, यतोहि  इमे भारतपावनभूमौ  भगवत्सेवाकर्तुमेव मानवजीवनं लब्धवन्तः। एतेषां मनुष्याणां परमसौभाग्यं वर्तते। वयं देवा एतत्सौभाग्येन वञ्चिताः स्मः।

॥ सत्यसनातनधर्मो विजयतेतराम् ॥

आपने जम्मू की वैष्णो माता का नाम अवश्य सुना होगा। आज हम आपको इन्हीं की कहानी सुना रहे हैं,

आपने जम्मू की वैष्णो माता का नाम अवश्य सुना होगा। आज हम आपको इन्हीं की कहानी सुना रहे हैं, जो बरसों से जम्मू-कश्मीर में सुनी व सुनाई जाती है। कटरा के करीब हन्साली ग्राम में माता के परम भक्त श्रीधर रहते थे। उनके यहाँ कोई संतान न थी।

वे इस कारण बहुत दुखी रहते थे। एक दिन उन्होंने नवरात्रि पूजन के लिए कुँवारी कन्याओं को बुलवाया। माँ वैष्णो कन्या वेश में उन्हीं के बीच आ बैठीं। अन्य कन्याएँ तो चली गईं किंतु माँ वैष्णो नहीं गईं।

वह श्रीधर से बोलीं-‘सबको अपने घर भंडारे का निमंत्रण दे आओ।’ श्रीधर ने उस दिव्य कन्या की बात मान ली और आस-पास के गाँवों में भंडारे का संदेश पहुँचा दिया। लौटते समय गोरखनाथ व भैरवनाथ जी को भी उनके चेलों सहित न्यौता दे दिया। सभी अतिथि हैरान थे कि आखिर कौन-सी कन्या है, जो इतने सारे लोगों को भोजन करवाना चाहती है?

श्रीधर की कुटिया में बहुत-से लोग बैठ गए। दिव्य कन्या ने एक विचित्र पात्र से भोजन परोसना आरंभ किया। जब कन्या भैरवनाथ के पास पहुँची तो वह बोले, ‘मुझे तो मांस व मदिरा चाहिए।’ ‘ब्राह्मण के भंडारे में यह सब नहीं मिलता।’ कन्या ने दृढ़ स्वर में उत्तर दिया। भैरवनाथ ने जिद पकड़ ली किंतु माता उसकी चाल भाँप गई थीं।

वह पवन का रूप धारण कर त्रिकूट पर्वत की ओर उड़ चलीं। भैरव ने उनका पीछा किया। माता के साथ उनका वीर लंगूर भी था। एक गुफा में माँ शक्ति ने नौ माह तक तप किया। भैरव भी उनकी खोज में वहाँ आ पहुँचा। एक साधु ने उससे कहा, ‘जिसे तू साधारण नारी समझता है, वह तो महाशक्ति हैं।’

भैरव ने साधु की बात अनसुनी कर दी। माता गुफा की दूसरी ओर से मार्ग बनाकर बाहर निकल गईं। वह गुफा आज भी गर्भ जून के नाम से जानी जाती है। देवी ने भैरव को लौटने की चेतावनी भी दी किंतु वह नहीं माना। माँ गुफा के भीतर चली गईं। द्वार पर वीर लंगूर था। उसने भरैव से युद्ध किया। जब वीर लंगूर निढाल होने लगा तो माता वैष्णो ने चंडी का रूप धारण किया और भैरव का वध कर दिया।

भैरव का सिर भैरों घाटी में जा गिरा। तब माँ ने उसे वरदान दिया कि जो भी मेरे दर्शनों के पश्चात भैरों के दर्शन करेगा, उसकी सभी मनोकामनाएँ पूरी होंगी। आज भी प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु माता वैष्णों के दर्शन करने आते हैं। गुफा में माता पिंडी रूप में विराजमान हैं।

।।श्रीमते रामानुजाय नमः।। श्रीमद्भागवत महापुराणम् : प्रथम स्कन्धः -------------------------------------------

।।श्रीमते रामानुजाय नमः।।

श्रीमद्भागवत महापुराणम् : प्रथम स्कन्धः
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अथ पञ्चदशोऽध्यायः
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श्रीकृष्ण के विरह से पूर्व से ही  दुखी  अर्जुन से  युधिष्ठिर का भिन्न-भिन्न प्रकार की आशंकाओं से युक्त प्रश्न करना और रोते-विलखते हुए अर्जुन का उत्तर देना
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सूत उवाच –

एवं कृष्णसखः कृष्णो भ्रात्रा राज्ञा विकल्पितः।
नानाशङ्कास्पदं रूपं कृष्णविश्लेषकर्शितः।। 1
  
सूतजी कहते हैं –

भगवान् श्रीकृष्ण के प्यारे सखा अर्जुन एक तो पहले ही श्रीकृष्ण के विरह से कृश हो रहे थे, उस पर राजा युधिष्ठिर ने उनकी विषादग्रस्त मुद्रा देखकर उसके विषय में कई प्रकार की आशंकाएँ करते हुए प्रश्नों की झड़ी लगा दी ।

शोकेन शुष्यद्वदनहृत्सरोजो हतप्रभः।
विभुं तमेवानुस्मरन्नाशक्नोत्प्रतिभाषितुम्।। 2
    
शोक से अर्जुन का मुख और हृदय - कमल सूख गया था , चेहरा फीका पड़ गया था। वे उन्हीं भगवान् श्रीकृष्ण के ध्यान में ऐसे डूब रहे थे कि बड़े भाई के प्रश्नों का कुछ भी उत्तर न दे सके ।

कृच्छ्रेण संस्तभ्य शुचः पाणिनाSमृज्य नेत्रयोः।
परोक्षेण समुन्नद्ध प्रणयौत्कण्ठ्यकातरः।। 3

सख्यं मैत्रीं सौहृदं च सारथ्यादिषु संस्मरन्।
नृपमग्रजमित्याह बाष्पगद्गदया गिरा ।। 4
    
श्रीकृष्ण की आँखों से ओझल हो जाने के कारण अर्जुन बढ़ी हुई प्रेमजनित उत्कंठा के परवश हो रहे थे। रथ हाँकने, टहलने आदि के समय भगवान् ने उनके साथ जो मित्रता ,  अभिन्नहृदयता और प्रेम से भरे हुए व्यवहार किये थे, उनकी याद-पर-याद  आ रही थी ; बड़े कष्ट से उन्होंने अपने शोक का वेग रोका, हाथ से नेत्रों के आँसू पोंछे और फिर रुँधे हुए गले से अपने बड़े भाई महाराज युधिष्ठिर से कहा –

अर्जुन उवाच–

वञ्चितोऽहं महाराज हरिणा बन्धुरूपिणा।
येन मेऽपहृतं तेजो देवविस्मापनं महत् ।।5
    
अर्जुन बोले –

महाराज ! मेरे ममेरे भाई अथवा अत्यन्त घनिष्ठ मित्र का रूप धारणकर श्रीकृष्ण ने मुझे ठग लिया। मेरे जिस प्रबल पराक्रम से बड़े -बड़े देवता भी आश्चर्य में डूब जाते थे, उसे श्रीकृष्ण ने मुझसे छीन लिया ।

यस्य क्षणवियोगेन लोको ह्यप्रियदर्शनः।
उक्थेन रहितो ह्येष मृतकः प्रोच्यते यथा।। 6
    
जैसे यह शरीर प्राण से रहित होने पर मृतक कहलाता है, वैसे ही उनके क्षणभर के वियोग से यह संसार अप्रिय दीखने लगता है ।

यत्संश्रयाद्द्रुपदगेहमुपागतानां
राज्ञां स्वयंवरमुखे स्मरदुर्मदानाम्।
तेजो हृतं खलु मयाभिहतश्च मत्स्यः
सज्जीकृतेन धनुषाधिगता च कृष्णा।। 7
    
उनके आश्रय से द्रौपदी-स्वयंवर में राजा द्रुपद के घर आये हुए कामोन्मत्त राजाओं का तेज मैंने हरण कर लिया, धनुष पर बाण चढ़ाकर मत्स्यवेध किया और इस प्रकार द्रौपदी को प्राप्त किया था ।

यत्सन्निधावहमु खाण्डवमग्नयेऽदामिन्द्रं
च सामरगणं तरसा विजित्य।
लब्धा सभा मयकृताद्भुतशिल्पमाया दिग्भ्योऽहरन्नृपतयो बलिमध्वरे ते ।।8
    
श्रीकृष्ण की सन्निधिमात्र से मैंने समस्त देवताओं के साथ इन्द्र को अपने बल से जीतकर अग्निदेव को उनकी तृप्ति के लिए खाण्डव वन का दान कर दिया और मय दानव की निर्माण की हुई अलौकिक कलाकौशल से युक्त मायामयी सभा प्राप्त की और आपके यज्ञ में सब ओर से आ -आकर राजाओं ने अनेकों प्रकार की भेंटें समर्पित कीं ।

                  क्रमशः..........

              –रमेशप्रसाद शुक्ल

              –जय श्रीमन्नारायण।

समय की .. इस अनवरत बहती धारा में .. अपने चंद सालों का .. हिसाब क्या रखें .. !!

💐💐💐Beautiful lines 💐💐💐

समय की .. इस अनवरत बहती धारा में ..
अपने चंद सालों का .. हिसाब क्या रखें .. !!

जिंदगी ने .. दिया है जब इतना .. बेशुमार यहाँ ..
तो फिर .. जो नहीं मिला उसका हिसाब क्या रखें .. !!

दोस्तों ने .. दिया है .. इतना प्यार यहाँ ..
तो दुश्मनी .. की बातों का .. हिसाब क्या रखें .. !!

दिन हैं .. उजालों से .. इतने भरपूर यहाँ ..
तो रात के अँधेरों का .. हिसाब क्या रखे .. !!

खुशी के दो पल .. काफी हैं .. खिलने के लिये ..
तो फिर .. उदासियों का .. हिसाब क्या रखें .. !!

हसीन यादों के मंजर .. इतने हैं जिंदगानी में ..
तो चंद दुख की बातों का .. हिसाब क्या रखें .. !!

मिले हैं फूल यहाँ .. इतने किन्हीं अपनों से ..
फिर काँटों की .. चुभन का हिसाब क्या रखें .. !!

चाँद की चाँदनी .. जब इतनी दिलकश है ..
तो उसमें भी दाग है .. ये हिसाब क्या रखें .. !!

जब खयालों से .. ही पुलक .. भर जाती हो दिल में ..
तो फिर मिलने .. ना मिलने का .. हिसाब क्या रखें .. !!

कुछ तो जरूर .. बहुत अच्छा है .. सभी में यारों ..
फिर जरा सी .. बुराइयों का .. हिसाब क्या रखें .. !!

              👌बहूत सुंदर कथा👌

                ☺मेरा वृन्दावन☺

एक राजा ने भगवान कृष्ण का एक मंदिर बनवाया
और पूजा के लिए एक पुजारी को लगा दिया. पुजारी बड़े भाव से
बिहारीजी की सेवा करने लगे. भगवान की पूजा-अर्चना और
सेवा-टहल करते पुजारी की उम्र बीत गई. राजा रोज एक फूलों की
माला सेवक के हाथ से भेजा करता था.पुजारी वह माला बिहारीजी
को पहना देते थे. जब राजा दर्शन करने आता तो पुजारी वह माला बिहारीजी के गले से उतारकर राजा को पहना देते थे. यह रोज का
नियम था. एक दिन राजा किसी वजह से मंदिर नहीं जा सका.
उसने एक सेवक से कहा- माला लेकर मंदिर जाओ. पुजारी से कहना
आज मैं नहीं आ पाउंगा. सेवक ने जाकर माला पुजारी को दे दी और
बता दिया कि आज महाराज का इंतजार न करें. सेवक वापस आ
गया. पुजारी ने माला बिहारीजी को पहना दी. फिर उन्हें विचार आया कि आज तक मैं अपने बिहारीजी की चढ़ी माला
राजा को ही पहनाता रहा. कभी ये सौभाग्य मुझे नहीं
मिला.जीवन का कोई भरोसा नहीं कब रूठ जाए. आज मेरे प्रभु ने
मुझ पर बड़ी कृपा की है. राजा आज आएंगे नहीं, तो क्यों न माला
मैं पहन लूं. यह सोचकर पुजारी ने बिहारीजी के गले से माला
उतारकर स्वयं पहन ली. इतने में सेवक आया और उसने बताया कि राजा की सवारी बस मंदिर में पहुंचने ही वाली है.यह सुनकर
पुजारी कांप गए. उन्होंने सोचा अगर राजा ने माला मेरे गले में देख
ली तो मुझ पर क्रोधित होंगे. इस भय से उन्होंने अपने गले से
माला उतारकर बिहारीजी को फिर से पहना दी. जैसे ही राजा
दर्शन को आया तो पुजारी ने नियम अुसार फिर से वह माला
उतार कर राजा के गले में पहना दी. माला पहना रहे थे तभी राजा को माला में एक सफ़ेद बाल दिखा.राजा को सारा माजरा समझ गया
कि पुजारी ने माला स्वयं पहन ली थी और फिर निकालकर
वापस डाल दी होगी. पुजारी ऐसाछल करता है, यह सोचकर राजा
को बहुत गुस्सा आया. उसने पुजारी जी से पूछा- पुजारीजी यह
सफ़ेद बाल किसका है.? पुजारी को लगा कि अगर सच बोलता हूं
तो राजा दंड दे देंगे इसलिए जान छुड़ाने के लिए पुजारी ने कहा- महाराज यहसफ़ेद बाल तो बिहारीजी का है. अब तो राजा गुस्से
से आग- बबूला हो गया कि ये पुजारी झूठ पर झूठ बोले जा रहा
है.भला बिहारीजी के बाल भी कहीं सफ़ेद होते हैं. राजा ने कहा-
पुजारी अगर यह सफेद बाल बिहारीजी का है तो सुबह शृंगार के
समय मैं आउंगा और देखूंगा कि बिहारीजी के बाल सफ़ेद है या
काले. अगर बिहारीजी के बाल काले निकले तो आपको फांसी हो जाएगी. राजा हुक्म सुनाकर चला गया.अब पुजारी रोकर
बिहारीजी से विनती करने लगे- प्रभु मैं जानता हूं आपके
सम्मुख मैंने झूठ बोलने का अपराध किया. अपने गले में डाली
माला पुनः आपको पहना दी. आपकी सेवा करते-करते वृद्ध हो
गया. यह लालसा ही रही कि कभी आपको चढ़ी माला पहनने का
सौभाग्य मिले. इसी लोभ में यह सब अपराध हुआ. मेरे ठाकुरजी पहली बार यह लोभ हुआ और ऐसी विपत्ति आ पड़ी है. मेरे
नाथ अब नहींहोगा ऐसा अपराध. अब आप ही बचाइए नहीं तो
कल सुबह मुझे फाँसी पर चढा दिया जाएगा. पुजारी सारी रात रोते
रहे. सुबह होते ही राजा मंदिर में आ गया. उसने कहा कि आज
प्रभु का शृंगार वह स्वयं करेगा. इतना कहकर राजा ने जैसे ही मुकुट
हटाया तो हैरान रह गया. बिहारीजी के सारे बाल सफ़ेद थे. राजा को लगा, पुजारी ने जान बचाने के लिए बिहारीजी के बाल रंग
दिए होंगे. गुस्से से तमतमाते हुए उसने बाल की जांच करनी
चाही. बाल असली हैं या नकली यब समझने के लिए उसने जैसे
ही बिहारी जी के बाल तोडे, बिहारीजी के सिर से खून
कीधार बहने लगी. राजा ने प्रभु के चरण पकड़ लिए और क्षमा
मांगने लगा. बिहारीजी की मूर्ति से आवाज आई- राजा तुमने आज तक मुझे केवल मूर्ति ही समझा इसलिए आज से मैं तुम्हारे
लिए मूर्ति ही हूँ. पुजारीजी मुझे साक्षात भगवान् समझते हैं.
उनकी श्रद्धा की लाज रखने के लिए आज मुझे अपने बाल सफेद
करने पड़े व रक्त की धार भी बहानी पड़ी तुझे समझाने के लिए.
यह कहानी किसी पुराण से तो नहीं है लेकिन इसका मर्म
किसी पुराण की कथा से कम भी नहीं है. कहते हैं- समझो तो देव नहीं तो पत्थर.श्रद्धा हो तो उन्हीं पत्थरों में भगवान सप्राण
होकर भक्त से मिलने आ जाएंगे ।।

श्री वृन्दावन बांके बिहारी लाल की जय हो  ।।

मैंने सुना है एक साधु और एक वेश्या की एक साथ मृत्यु हुई,

मैंने सुना है
एक साधु और एक वेश्या की
एक साथ मृत्यु हुई,
एक ही दिन।
आमने-सामने घर था।
मृत्यु के दूत लेने आए,
तो दूत बड़ी मुश्किल में पड़ गए।
उन्हें फिर जाकर
हेड आफिस में पता लगाना पड़ा
कि मामला क्या है!
क्योंकि संदेश में कुछ भूल मालूम पड़ती थी।

साधु को ले जाने की आज्ञा हुई नर्क,
और वेश्या को आज्ञा हुई स्वर्ग!
तो उन्होंने कहा,
इसमें जरूर कहीं भूल हो गई है!
साधु बड़ा साधु था,
वेश्या भी कोई छोटी वेश्या नहीं थी।
मामला सीधा साफ है,
गणित में कोई गड़बड़ है।
वेश्या को नर्क जाना चाहिए,
साधु को स्वर्ग जाना चाहिए।

काश,
जिंदगी इतनी सीधी होती,
तो सभी वेश्याएं नर्क चली जातीं
और सभी साधु स्वर्ग चले जाते।
लेकिन जिंदगी इतनी सीधी नहीं है,
जिंदगी बहुत जटिल है।

ऊपर से पता लगाकर लौटे।
खबर मिली कि वही ठीक आज्ञा है,
वेश्या को स्वर्ग ले आओ,
साधु को नर्क।

उन्होंने पूछा,
थोड़ा हम समझ भी लें,
क्योंकि हम बड़ी दुविधा में पड गए हैं।
तो पता चला
कि जब भी साधु के घर में सुबह कीर्तन होता, तो !
वेश्या रोती अपने घर में।
सामने ही घर था।

रोती,
रोती इस मन से कि
मेरा जीवन व्यर्थ गया।
कब वह क्षण आएगा सौभाग्य का
कि ऐसे कीर्तन में मैं भी सम्मिलित हो जाऊं!
मन भी होता,
तो कभी द्वार के बाहर निकल आती।
साधु के मंदिर के पास कान लगाकर खड़ी हो जाती दीवाल के। लेकिन मन में ऐसा लगता कि मुझ जैसी पापी मंदिर में कैसे प्रवेश करे!
तो कहीं साधु पता न चल जाए,
इसलिए चुपचाप छिप-छिपकर कीर्तन सुनती। मंदिर की सुगंध उठती, धूप जलती, मंदिर के फूलों की खबर आती, मंदिर का घंटा बजता, और चौबीस घंटे, पूरे जीवन वेश्या मंदिर में रही। चित्त मंदिर में घूमता रहा, घूमता रहा, घूमता रहा। और एक ही कामना थी कि अगले जन्म में चाहे बुहारी ही लगानी पड़े, पर मंदिर में ही जन्म हो। मंदिर के द्वार पर ही!

साधु भी कुछ पीछे न थे वेश्या से। जब भी वेश्या के घर रात। राग-रंग छिड़ जाता, आधी रात होती, तो वे करवट बदलते रहते! वे सोचते, सारी दुनिया मजा लूट रही है। हम कहां फंस गए!  इसलिए ध्यान रहे, पुजारी परमात्मा से जितने दूर रह जाते हैं, उतना शायद ही कोई रह पाता हो। क्योंकि पुजारी को प्रयोजन ही नहीं रह जाता। उसका मतलब कुछ और है। यह उसके लिए धंधा है।

उपासना आप उधार नहीं करवा सकते, आपको ही करनी पड़ेगी। और ऐसी उपासना का कोई मूल्य नहीं है कि मंदिर में तो परमात्मा के निकट होते हों और मंदिर के बाहर निकलते ही परमात्मा खो जाता हो। ऐसी उपासना से क्या होगा? अगर वह है, तो सब जगह है। और अगर नहीं है, तो कहीं भी नहीं है, मंदिर में भी नहीं है। अगर नहीं है, तो सब मंदिर व्यर्थ हैं। और अगर है, तो सारी पृथ्वी, सारा जगत उसका मंदिर है।

एक वृक्ष के पास बैठें, तो भी परमात्मा के पास बैठें। और एक पशु के पास खड़े हों, तो भी परमात्मा के पास खड़े हों। एक मित्र पास हो, तो भी परमात्मा पास हो, और एक शत्रु पास हो, तो भी परमात्मा पास हो। आपके लिए वही रह जाए। जितना यह बढ़ता चला जाए विस्तार, जितनी यह प्रतीति उसकी गहन होती चली जाए, उतने ही आप उपासना में रत हो रहे हैं।

उपासना का अर्थ होता है, उसके पास बैठना। कहीं भी बैठे हों, अगर अनुभव करें कि परमात्मा के पास बैठे हैं, तो उपासना हो गई। घर में बैठे हों, कि मंदिर में, कि जंगल में, कहीं भी बैठे हों, अगर उसकी उपस्थिति अनुभव कर सकें, अगर अनुभव कर सकें उसका स्पर्श—कि हवाओं में वही छूता है, और सूरज की किरणों में वही आता है, और पक्षियों के गीत में उसी के गीत हैं, और वृक्षों में जो सरसराहट होती है हवा की, पत्ते जो कंपते हैं, वही कंपता है, सागर की जो लहर हिलती है, यह उसी की तरंगें हैं—अगर ऐसी प्रतीति हो सके, तो उपासना हो गई।

- ओशो

जीव के श्री राम के सन्मुख और विमुख होने का परिणाम । सन्मुख-

जीव के श्री राम के सन्मुख और विमुख होने का परिणाम ।
सन्मुख-
"सन्मुख होई जीव मोहि जबहीं,जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं".

जैसे ही जीव मेरे सन्मुख होता है उसके करोडो जन्मों के पाप स्वतः ही भस्म हो जाते हैं.सन्मुख होने का मतलब किसी मंदिर,मस्जिद,गुरूद्वारे में जाकर मूर्ति के सामने खड़ा होना नहीं है.मन में श्री राम की छबि को स्थापित करना है.
लंकिनी हनुमान जी महाराज को आशीर्वाद दे रही है-
"प्रविसी नगर कीजै सब काजा,ह्रदय राख कौशलपुर राजा".
माता जानकी हनुमान जी को आशीर्वाद दे रही हैं-
"देखि बुद्धि बल निपुण कपि,कहेहु जानकी जाहु.
रघुपति चरण ह्रदय धरी,तात मधुर फल खाऊ".
अर्थात सन्मुख होने का मतलब तन से नहीं है मन से है.मन यदि श्री राम के चरणों में पहुँच जाता है तो मन ही तो सुख दुःख का अनुभव करता है.फिर तन के सुख-दुःख का कोई भी भान नहीं होता.
"मन-तहं जहं रघुवर बैदेही,बिनु मन तन दुःख सुख सुधि केही".
जैसे कोई हमारे शरीर में एक सुई चुबोये,क्योंकि मन शरीर के साथ है इसलिए हम दुःख का अनुभव कर चिल्ला उठते हैं.परन्तु डाक्टर पूरा पेट फाड़ देता है हमे पता भी नहीं चलता.कारन डाक्टर पहले दवा देकर मन को शरीर से अलग कर देता है अब हमे शरीर के सुख दुःख का कोई अनुभव नहीं होता.
श्री राम के सन्मुख होने का परिणाम-
"गरल सुधा रिपु करे मिताई,गोपद सिन्धु अनल सितलाई.
गरुअ सुमेर रेनु सम ताही,राम कृपा करी चितवा जाही".
जहर अमृत हो जाता है,शत्रु मित्र बन जाते हैं.भव समुद्र गाय के खुर के समान हो जाता है.अग्नि शीतल हो जाती है.अति भारी सुमेरु पर्वत धूल के कण के बराबर हल्का हो जाता है.जो राम के सन्मुख होता है अथवा जिसपर राम की कृपा दृष्टि पड़ती है.
श्री राम के विमुख होने के परिणाम-
"मातु मृत्यु पितु समन समाना सुधा होई विष सुन हरी जाना।।
मित्र करे सत रिपु कै करनी।ताकंह विबुध नदी बैतरनी।।
सब जग ताहि अनलहूँ ते ताता,।जो रघुवीर विमुख सुन भ्राता"।।
माँ मृत्यु हो जाती है पिता जमराज हो जाता है,अमृत जहर हो जाता है।मित्र सौ-सौ शत्रुओं के समान व्यहवार करता है।उसके गंगा भी भव समुद्र से भी ज्यादा भयंकर हो जाती है.सारा संसार अग्नि से भी ज्यादा तप्त हो जाता है.जो जीव श्री राम के विमुख होता है.अर्थात जिसके मन में श्री राम नहीं है ।
* पापवंत कर सहज सुभाऊ। भजनु मोर तेहि भाव न काऊ॥
जौं पै दुष्ट हृदय सोइ होई। मोरें सनमुख आव कि सोई॥
              पापी का यह सहज स्वभाव होता है कि मेरा भजन उसे कभी नहीं सुहाता। यदि वह (रावण का भाई) निश्चय ही दुष्ट हृदय का होता तो क्या वह मेरे सम्मुख आ सकता था?॥

* निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा॥