Wednesday, November 16, 2016

संघ नियमावली

ॐसच्चा नामधेयाय श्री गुरवे परमात्मने नमः
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जिसका पालन करना "धर्मार्थ वार्ता समाधान संघ"के सभी विद्वत आचार्यसदस्यों को अनिवार्य होगा।
धर्मार्थ वा०स० संघ-नियमावली
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१.सर्व प्रथम संघ के सभी आदरणीय श्रेष्ठ विद्वत आचार्य गणों से वार्ता करते समय उनके नाम के आगे सम्मान सूचक शब्द अवश्य लगायें।
२.श्रेष्ठ आचार्य गणों द्वारा छोटों को भी उचित सम्मान से ही संबोधित किया जाये।
३.आपसी शिष्टाचार एवम्
सौम्यता बनाते हुये सब से प्रेम पूर्वक सदाचार का परिचय दें |
४.किसी भी सदस्य के प्रति हीन भावना न रखते हुये सब को अपने परिवार का अभिन्न अंग माने।
५.किसी भी विद्वत सदस्य के ऊपर कोई भी ऐसी टिप्पणी न करें जिससे किसी का मन आहत हो या किसी को दुःख पहुँचे।
६.संघ के नाम एवम् प्रोफाइल फोटो से किसी प्रकार की छेड़खानी न करें यह कार्य संस्थापक महोदय एवं संचालक समिति के अंतर्गत आता है।
७.किसी भी प्रकार के अनावश्यक मैसेज न भेजें,जैसे चुटकुले, शायरी,कॉमेडी या 'ये मैसेज २० लोगो को शेयर करो शाम तक अच्छी खबर मिलेगी नहीँ तो आपका अनिष्ट होगा'_ इस प्रकार के मैसेज भेजना दण्डनीय अपराध माना जायेगा।
८.संघ में मात्र केवल सनातन धर्म,आध्यात्म,पुराण,
वेदोपनिषद् ,समस्त सनातन धर्म से सम्बंधित संग्रह ही भेजें। वह भी लिखित इमेज लेख न हो |
९.किसी भी सदस्य के प्रति हास परिहास,आपत्तिजनक टिप्पणी न करें,जिससे किसी भी प्रकार का विवाद हो।
१०.किसी भी सदस्य को अपनी विद्वता से निचा दिखाने का प्रयास न करें,बल्कि अपने ज्ञान को प्रेम पूर्वक प्रस्तुत करें।
११.किसी भी प्रश्न के ऊपर चल रही वार्ता समाधान  के वक्त दूसरे पोस्ट न भेजें |
१२.कोई भी चित्र या वीडियो फोटो भेजना विशेष मुख्य रूप से वर्जित है इसका विशेष ध्यान रखें |किसी भी सदस्य द्वारा इमेज या वीडियो भेजे जाने पर,समिति द्वारा २४ घंटे के लिये तत्काल निष्कासित किया जायेगा |कारण स्पष्ट होने के बाद ही पुन: जोड़ा जा सकता है |
१३.संघ में किसी भी नए अतिथि विद्वान के आने पर उनका समुचित स्वागत अभिवादन करना हम सब के अच्छे शिष्टाचार का परिचायक है |
१४.किसी भी सदस्य से किसी प्रकार की त्रुटि होने पर उनके प्रति अन्य कोई सदस्य न उलझें। उसका समाधान, प्रशासनिक श्रेष्ठ गुरुजनों द्वारा या संघ संस्थापक द्वारा किया जायेगा। यदि किसी को किसी से शिकायत है तो वे संस्थापक महोदय या प्रसाशनिक समिति के किसी भी गुरूजन सदस्यों से पर्सनल एकाउंट में जाकर अपनी बात रख सकते हैं !
१५.अगर अपने निजी कारणों बस कोई भी सदस्य संघ से बाहर होना चाहते हैं तो कृपया सूचना अवश्य देने की कृपा करें।
१६.संघ के नियमो को कुछ और सुदृढ़ बनाने के लिए आप सब अपनी राय दे सकते हैं संस्थापक महोदय के पर्शनल में।
१७."आप सभी विद्वत जन अपने प्रोफाइल में अपनी फोटो व अपना नाम अवश्य लिखें |
१८.कभी कभी मनोविनोद एवं मनोरंजन की वार्ता को अन्यथा न लेकर आनन्द की अनुभूति करें क्यों कि इस भागदौड़भरे जीवन में हसना और हसाना भी बहुत आवश्यक है ! लेकिन हास्य सामाजिक मर्यादा को ध्यान में रखते हुये करें |
१९.संघ में किसी भी पोस्ट को दुबारा पोस्ट करना वर्जित है किसी सदस्य के आग्रह करने पर ही दुबारा पोस्ट भेज सकते हैं |
२०.संघ को और मजबूत बनाने हेतु विशिष्ठ विद्वत जनों की आवश्यकता होती है,अतः जिन विद्वत जनों के सम्पर्क में अच्छे शुमधुर व्यवहार वाले ज्ञानमय ब्राम्हण हों,उन विद्वानों को जोड़ने के लिए संस्थापक महोदय या समिति के गुरू जनों से सम्पर्क कराएं तथा उन्हें संघ के नियमो से भी अवगत कराये |
२१.संघ में वार्ता करने का समय सुबह ५:३०से रात्रि ११:००तक विशेष आवश्यकता पड़ने पर १२:००तक
२२. संघ में किसी भी प्रकार के लिंक भेजना वर्जित है!!!!!!!! 
२३.धर्मार्थ वार्ता समाधान की प्रशासनिक-सूची :—
१--स्वतंत्र प्रभार--:श्री मान संतोष मिश्र (शोष जी)
श्रीमान् विजयभान गोस्वामी जी
२--न्यायाधीश--:श्रीमान् सत्यप्रकाश अनुरागी जी 
३--उप न्यायाधीश--: यज्ञाचार्य श्रीमान ब्रजभूषण त्रिपाठी जी 
४.संस्थापक एवं अध्यक्ष--: श्रीमान् मंगलेश्वर त्रिपाठी जी 
५.उपाध्यक्ष--:श्रीमान् अनिल पाण्डेय जी(मुं.दे.)
६.कोशाध्यक्ष--: श्रीमान दीना नाथ तिवारी जी
७.प्रवक्ता--:श्रीमान् ओमीश जी (कोपरखैरणे महालक्ष्मी मन्दिर)
एवं श्रीमान् विद्यानिधि जी
८.--:सचिव--:श्रीमान पं. आलोक शास्त्री जी 
९.उप सचिव--:रोहित परासर जी
१०.संयोजक--:श्रीमान् सत्यप्रकाश शुक्ल जी (हिमांचल) 
श्रीमान संदीप त्रिपाठी जी 
श्रीमान शिव शंकर मिश्र जी (प्रयाग) 
११.मार्गदर्शक--:श्रीमान् सूर्यमणि मिश्र जी,श्रीमान बलभद्र उपाध्याय जी,श्रीमान शिवाकान्त त्रिपाठी जी,श्रीमान सान्ति भूषण त्रिपाठी जी,
श्रीमान नीरजधर द्विवेदी जी 
श्रीमान पवनेश शुक्ल जी
श्रीमान पद्मधर मिश्र जी
१२--:व्यवस्थापक ÷श्रीमान् रवीन्द्र व्यास जी (यू-पी भवन नवी मुंबई) एवं समस्त धर्मार्थ परिवार !
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जयतु गुरुदेव, जयतु भारतम्

संघ नियमावली

Sunday, November 6, 2016

'उगते सूरज की पूजा' तो संसार का विधान है

'उगते सूरज की पूजा' तो संसार का विधान है, पर केवल और केवल हम 'भारतवासी' अस्ताचल सूर्य की भी अराधना करते हैं, और वो भी, उगते सूर्य से पहले। अगर 'उदय' का 'अस्त' भौगोलिक नियम है, तो 'अस्त' का 'उदय' प्राकृतिक और आध्यात्मिक सत्य।

प्रकृति के अंतिम स्वरूप और ऊर्जा के अक्षुण्ण श्रोत , भगवान भास्कर की अराधना का पर्व 'छठ' की शुभकामनाएँ।

Friday, October 28, 2016

धनतेरश का त्योहार दीपावली आने की पूर्व सूचना देता है।

आप को धनतेरस की हार्दिक शुभकामनाऐँ। हम सब को बल, बुद्धि, ज्ञान, भक्ति 
और वैराग्य मिलता रहे यही भगवान से प्रार्थना है।
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धनतेरश का त्योहार दीपावली आने की पूर्व सूचना देता है। हमारे देश में 
सर्वाधिक धूमधाम से मनाए जाने वाले त्योहार दीपावली का प्रारंभ धनतेरस से 
हो जाता है। इसी दिन से घरों की लिपाई-पुताई प्रारम्भ कर देते हैं। 
दीपावली के लिए विविध वस्तुओं की ख़रीद आज की जाती है। इस दिन से कोई 
किसी को अपनी वस्तु उधार नहीं देता। इसके उपलक्ष्य में बाज़ारों से नए 
बर्तन, वस्त्र, दीपावली पूजन हेतु लक्ष्मी- गणेश, खिलौने, खील-बताशे तथा 
सोने- चांदीके जेवर आदि भी ख़रीदे जाते हैं। 
आज ही के दिन आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति के जन्मदाता धन्वन्तरिवैद्य 
समुद्र से अमृत कलश लेकर प्रगट हुए थे, इसलिए धनतेरस को धन्वन्तरि जयन्ती 
भी कहते हैं। इसीलिए वैद्य-हकीम और ब्राह्मण समाज आज धन्वन्तरि भगवान का 
पूजन कर धन्वन्तरि जयन्ती मनाता है। 
*महत्त्व* 
धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से भी इस दिन का विशेष महत्त्व है। शास्त्रों 
में इस बारे में कहा है कि जिन परिवारों में धनतेरस के दिन यमराज के 
निमित्त दीपदान किया जाता है, वहां अकाल मृत्यु नहीं होती। घरों में 
दीपावली की सजावट भी आज ही से प्रारम्भ हो जाती है। इस दिन घरों को 
स्वच्छ कर, लीप-पोतकर, चौक, रंगोली बना सायंकाल के समय दीपक जलाकर 
लक्ष्मी जी का आवाहन किया जाता है। इस दिन पुराने बर्तनों को बदलना व नए 
बर्तन ख़रीदना शुभ माना गया है। इस दिन चांदी के बर्तन ख़रीदने से तो 
अत्यधिक पुण्य लाभ होता है। इस दिन हल जुती मिट्टी को दूधमें भिगोकर 
उसमें सेमर की शाखा डालकर लगातार तीन बार अपने शरीर पर फेरना तथा कुंकुम 
लगाना चाहिए। कार्तिक स्नानकरके प्रदोष काल में घाट, गौशाला, कुआं, 
बावली, मंदिर आदि स्थानों पर तीन दिन तक दीपक जलाना चाहिए। तुला राशि के 
सूर्य में चतुर्दशी व अमावस्या की सन्ध्या को जलती लकड़ी की मशाल से 
पितरों का मार्ग प्रशस्त करना चाहिए। 
*!! धनतेरस की यमराज को दीप देने की कथा !!*
धनतेरस की शाम घर के बाहर मुख्य द्वार पर और आंगन में दीप जलाने की प्रथा 
भी है। इस प्रथा के पीछे एक लोक कथा है, कथा के अनुसार किसी समय में एक 
राजा थे जिनका नाम हेम था। दैव कृपा से उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति 
हुई। ज्योंतिषियों ने जब बालक की कुण्डली बनाई तो पता चला कि बालक का 
विवाह जिस दिन होगा उसके ठीक चार दिन के बाद वह मृत्यु को प्राप्त होगा। 
राजा इस बात को जानकर बहुत दुखी हुआ और राजकुमार को ऐसी जगह पर भेज दिया 
जहां किसी स्त्री की परछाई भी न पड़े। दैवयोग से एक दिन एक राजकुमारी उधर 
से गुजरी और दोनों एक दूसरे को देखकर मोहित हो गये और उन्होंने गन्धर्व 
विवाह कर लिया। 
विवाह के पश्चात विधि का विधान सामने आया और विवाह के चार दिन बाद यमदूत 
उस राजकुमार के प्राण लेने आ पहुंचे। जब यमदूत राजकुमार प्राण ले जा रहे 
थे उस वक्त नवविवाहिता उसकी पत्नी का विलाप सुनकर उनका हृदय भी द्रवित हो 
उठा परंतु विधि के अनुसार उन्हें अपना कार्य करना पड़ा। यमराज को जब 
यमदूत यह कह रहे थे उसी वक्त उनमें से एक ने यमदेवता से विनती की हे 
यमराज क्या कोई ऐसा उपाय नहीं है जिससे मनुष्य अकाल मृत्यु के लेख से 
मुक्त हो जाए। दूत के इस प्रकार अनुरोध करने से यमदेवता बोले हे दूत अकाल 
मृत्यु तो कर्म की गति है इससे मुक्ति का एक आसान तरीका मैं तुम्हें 
बताता हूं सो सुनो। कार्तिक कृष्ण पक्ष की रात जो प्राणी मेरे नाम से 
पूजन करके दीप माला दक्षिण दिशा की ओर भेट करता है उसे अकाल मृत्यु का भय 
नहीं रहता है। यही कारण है कि लोग इस दिन घर से बाहर दक्षिण दिशा की ओर 
दीप जलाकर रखते हैं। 🌷🙏🌷

*वर्षोद्भवम्*

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               *वर्षोद्भवम्*
               *शरत्पक्वधान्यम्,*
               *आल्हादकम्*
               *हेमंत-शिशीरशैत्यम्।*
               *मिष्टान्नभोगम्*
               *नववसनयोगम्,*
               *आनंदपर्वम्*
               *दीपोत्सवोऽयम्॥*
                    *...........*
               *॥शुभदीपावली॥*

आज से आरंभ दिपउत्सव की
आपको हार्दिक शुभकामनाये .....

Monday, October 24, 2016

हिमाद्रि संकल्प

ॐ स्वस्ति श्री समस्त जगदुत्पत्तिस्थितिलयकारणस्य रक्षा – शिक्षा – विचक्षणस्य प्रणतपारिजातस्य अशेषपराक्रमस्य श्रीमदनन्तवीर्यस्यादि नारायणस्य अचिन्त्यापरिमितशक्त्या ध्रियमाणानां महाजलौघमध्ये परिभ्रमताम् अनेककोटि ब्रह्माण्डानाम् एकतमे अव्यक्त– महदहंकार – पृथिव्यप्तेजो वाय्वाकाशाद्यावरणैरावृते अस्मिन् महति ब्रह्माण्डखण्डे आधारशक्तिश्रीमदादि –वाराह – दंष्ट्राग्र – विराजिते कूर्मानन्त – वासुकि –तक्षक – कुलिक कर्कोटक – पद्म – महापद्म –शङ्खाद्यष्ट महानागैर्ध्रियमाणे एरावत – पुण्डरीक –वामन – कुमुदाञ्जन – पुष्पदन्त – सार्वभौम –सुप्रतीकाष्टदिग्गजोपरिप्रतिष्ठितानाम् अतल – वितल –सुतल – तलातल – रसातल – महातल – पाताल –लोकानामुपरिभागे पुण्यकृन्निवासभूत भूर्लोक –भुवर्लोक – स्वर्लोक – महर्लोक – जनोलोक –तपोलोक  सत्यलोकाख्यसप्तलोकानामधोभागे चक्रवालशैलमहावलयनागमध्यवर्तिनो महाकाल महाफणिराजशेषस्य सहस्त्रफणामणिमण्डलमण्डिते दिग्दन्तिशुण्डादण्डोद्दन्डिते अमरावत्यशोकवती भोगवती – सिद्धवती – गान्धर्ववती – काञ्ची –अवन्ती अलकावती यशोवतीतिपुण्यपुरीप्रतिष्ठि ते लोकालोकाचलवलयिते लवणेक्षु – सुर सर्पि – दधि –क्षीरोदकार्णवपरिवृते जम्बू – प्लक्ष – कुश – क्रोञ्च –शाक शाल्मलिपुष्कराख्यसप्तद्वीपयुते इन्द्र – कांस्य –ताम्र – गभस्ति – नाग – सोम्य – गन्धर्व –चारणभारतेतिनवखण्डमण्डिते सुवर्णगिरिकर्णिकोपेतमहासरोरुहाकारपञ्चाशत् कोटियोजनविस्तीर्णभूमण्डले अयोध्या मथुरा – माया –काशी – काञ्ची – अवन्तिकापुरी –द्वारावतीतिमोक्षदायिकसप्तपुरीप्रतिष्ठिते सुमेरु निषधत्रिकूट – रजतकूटाम्रकूट – चित्रकूट –हिमवद्विन्ध्याचलानां महापर्वत प्रतिष्ठिते हरिवर्षकिं पुरुषभारतवर्षयोश्च दक्षिणे नवसहस्रयोजन विस्तीर्णे मलयाचल – सह्याचल विन्ध्याचलानामुत्तरे स्वर्णप्रस्थ– चण्डप्रस्थ – चान्द्र – सूक्तावन्तक – रमणक –महारमणक – पाञ्चजन्य – सिंहल – लङ्केति –नवखण्डमण्डिते गंगा – भागीरथी – गोदावरी – क्षिप्रा– यमुना – सरस्वती – नर्मदा – ताप्ती – चन्द्रभागा –कावेरी – पयोष्णी – कृष्णा – वेण्या – भीमरथी –तुंगभद्रा ताम्रपर्णी – विशालाक्षी – चर्मण्वती – वेत्रवती– कौशिकी – गण्डकी – विश्वामित्रीसरयूकरतोया –ब्रह्मानन्दामहीत्यनेकपुण्यनदीविराजिते दण्डक –विन्ध्यक – चम्पक – बदरिक – महीलांगुहेक्षुक नैमिष– कदलिक देवदार्वाख्यदशारण्ययुते भारतवर्षे सकल देवतानां निवासभूमौ, वेदभूमौ श्रीभगवतो महापुरुषस्य नाभिसरोरुहादुत्पन्नस्य तदाज्ञया प्रवर्तमाने सकलजगत्स्रष्टुः परार्धद्वयजीविनो ब्रह्मणः प्रथमे परार्धे पंचाशदब्दात्मिके व्यतीते द्वितीये परार्धे रथन्तरादिद्वात्रिंशतकल्पानांमध्ये अष्टमे श्वेतवाराहकल्पे प्रथमे वर्षे प्रथम मासे प्रथम पक्षे प्रथमे दिवसे अह्नि द्वितीये यामे तृतीये मुहूर्ते स्वायम्भुव स्वारोचिषोत्तम् तामस रैवत चाक्षुषाख्येषु षट्सु मनुषु व्यतीतेषु सप्तमे वैवस्वतमन्वन्तरे कृत त्रेताद्वापरकलिसंज्ञकानां चतुर्णां युगानां मध्ये वर्तमाने अष्टाविंशतितमे कलियुगे प्रथमे पादे महर्षि ज्ञानयुगीयवैदिकविश्वप्रशासनस्य राजधान्यां पूर्णभूमौ, भारतवर्षस्य ब्रह्मस्थाने, महर्षि वेद विज्ञान विश्व विद्यापीठ परिसरे चान्द्र सौरसावनमानानां प्रभवादि षष्ठि सम्वत्सराणां मध्ये_________ सम्वत्सरे________उत्तरसहस्रद्वयपरिमिते वैक्रमाब्दे ____________ उत्तर एकोनविंशतिशततमे शालिवाहन शकाब्दे ________उत्तर एक पञ्चाशच्छततमेयुधिष्ठिर सम्वत्सरे उत्तर पञ्चविंशतिशततमे आद्यशङ्कराचार्य सम्वत्सरे महर्षि ज्ञानयुगीय __________सम्वत्सरे ________अयने________ऋतो _______मासे _______पक्षे________तिथौ ______वासरे _______नक्षत्रे________योगे _________करणे________राशिस्थितेश्रीचन्द्रे________रशिस्थितेश्रीसूर्ये_________रशिस्थितेश्रीभौमे_________रशिस्थितेश्रीबुधे_________रशिस्थितेश्रीदेवगुरौ_________रशिस्थितेश्रीशुक्रे_________रशिस्थितेश्रीशनौ_________रशिस्थितेश्रीराहौ_________रशिस्थितेश्रीकेतौ एवं ग्रहगणगुणविशेषण विशिष्टायां पुण्यायां पुण्यकालेमहापुण्य शुभतिथौ_____________

जयतु संस्कृतम्

जयतु संस्कृतम्

संस्कृत देवभाषा है ! यह सभी भाषाओँ की जननी है ! विश्व  की समस्त भाषाएँ इसी के गर्भ से उद्भूत हुई है ! वेदों की रचना इसी भाषा में होने के कारण  इसे वैदिक  भाषा भी कहते हैं ! संस्कृत  भाषा का प्रथम काव्य-ग्रन्थ  ऋग्वेद को माना जाता है ! ऋग्वेद को आदिग्रन्थ भी कहा जाता है ! किसी भी भाषा के उद्भव के बाद इतनी दिव्यता एवं अलौकिक कृति का सृजन कहीं दृष्टिगोचर नहीं होता है ! ऋग्वेद की ऋचाओं में संस्कृत भाषा का लालित्य , व्याकरण  , व्याकरण , छंद, सौंदर्य , अलंकार अद्भुत एवं आश्चर्यजनक है ! दिव्य ज्ञान  का यह विश्वकोश संस्कृत की समृद्धि का परिणाम है ! यह भाषा अपनी दिव्य एवं दैवीय विशेषताओं के कारण  आज भी उतनी ही प्रासंगिक एवं जीवंत है !
संस्कृत का तात्पर्य परिष्कृत, परिमार्जित  ,पूर्ण, एवं अलंकृत है ! यह भाषा इन सभी विशेषताओं से पूर्ण है ! यह भाषा अति परिष्कृत एवं परिमार्जित है ! इस भाषा में भाषागत त्रुटियाँ नहीं मिलती हैं जबकि अन्य  भाषाओं के साथ ऐसा नहीं है ! यह परिष्कृत होने के साथ-साथ अलंकृत भी है ! अलंकर इसका सौंदर्य है !  अतः संस्कृत को पूर्ण भाषा का दर्जा दिया गया है ! यह अतिप्राचीन एवं आदि भाषा है ! भाषा विज्ञानी इसे इंडो-इरानियन परिवार का सदस्य  मानते है ! इसकी प्राचीनता को ऋग्वेद के साथ जोड़ा जाता है ! अन्य मूल भारतीय ग्रन्थ भी संस्कृत में ही लिखित है !
संस्कृत का प्राचीन व्याकरण  पाणिनि का अष्टाध्यायी है ! संस्कृत को   वैदिक एवं क्लासिक संस्कृत के रूप में प्रमुखतः विभाजित किया जाता है ! वैदिक संस्कृत में वेदों से लेकर उपनिषद तक की यात्रा सन्निहित है , जबकि क्लासिक संस्कृत में पौराणिक ग्रन्थ, जैसे रामायण,महाभारत आदि हैं ! भाषा विज्ञानी श्री भोलानाथ तिवारी जी के अनुसार इसके चार भाग किये गए हैं — पश्चिमोत्तरी, मध्यदेशी, पूर्वी, एवं दक्षिणी !
संस्कृत की इस समृद्धि ने पाश्चात्य विद्वानों को अपनी ओर अकर्षित  किया है ! इस भाषा से प्रभावित होकर सर विलियम जोन्स ने २ फरवरी, १७८६ को एशियाटिक सोसायटी , कोल्कता में कहा- ” संस्कृत एक अद्भुत भाषा है ! यह ग्रीक से अधिक पूर्ण है, लैटिन से अधिक समृद्ध और अन्य किसी भाषा से अधिक परिष्कृत है !” इसी कारण संस्कृत को सभी भाषाओं की जननी कहा जाता है ! संस्कृत को देव भाषा वर्ग के अंतर्गत रखा जाता है और सभी भाषाओं की उत्पत्ति का सूत्रधार इसे माना जाता है !
समस्त विश्व की भाषाओं को ११ वर्गों में बाँटा गया है :-
१) इंडो इरानियन- इसके भी दो उपवर्ग है – एक में इंडो-आर्यन जिसमें संस्कृत एवं इससे उद्भूत भाषाएँ हैं, दुसरे वर्ग में ईरानी भाषा जिसमें अवेस्तन , पारसी एवं पश्तो भाषाएँ आती हैं !
२) बाल्टिक:- इसमें लुथी अवेस्तन  लेटवियन  आदि भाषाएँ आती हैं !
३) स्लैविक :- इसमें रसियन, पोलिश, सर्वोकोशिया, आदि भाषाएँ सम्मिलित हैं !
४) अमैनियम:-इसके अंतर्गत अल्बेनिया आती हैं !
५) ग्रीक –
६) सेल्टिक;- इसके अंतर्गत आयरिश , स्कॉटिश गेलिक, वेल्स एवं ब्रेटन भाषाएँ आती है !
७) इटालिक – इसमें लैटिन एवं इससे उत्पन्न भाषाएँ सम्मिलित हैं !
८) रोमन :- इटालियन, फ्रेंच, स्पेनिश, पोर्तुगीज, रोमानियन एवं अन्य भाषाएँ इसमें सम्मिलित हैं !
९) जर्मनिक :- जर्मन , अंग्रेजी, डच, स्कैनडीनेवियन भाषाएँ आती है इस वर्ग में !
१०) अनातोलियन :- हिटीट पालैक, लाय्दियाँ, क्युनिफार्म, ल्युवियान, हाइरोग्लाफिक ल्युवियान  और   लायसियान   !
११) लोचरीयन (टोकारिश):- इसे उत्तरी चीन में प्रयोग किया जाता है, इसकी लिपि  ब्राह्मी लिपि से मिलती है !
भाषाविद मानते हैं कि इन सभी भाषाओँ की उत्पत्ति का तार कहीं-न-कहीं से संस्कृत से जुड़ा हुआ है; क्योंकि यह सबसे पुरानी एवं समृद्ध भाषा है ! किसी भी भाषा की विकासयात्रा में  उसकी यह विशेषता जुडी होती है कि वह विकसित होने की कितनी क्षमता  रखती है !   जिस भाषा में यह क्षमता विद्यमान होती है , वह दीर्घकाल तक अपना अस्तित्व बनाये रखती है , परन्तु जिसमें इस क्षमता का आभाव होता  है उनकी विकासयात्रा थम जाती है ! यह सत्य है कि  संस्कृत  भाषा आज प्रचालन में नहीं है परन्तु इसमें अगणित विशेषताएं मौजूद हैं ! इन्हीं विशेषताओं को लेकर इसपर कंप्यूटर के क्षेत्र में भी प्रयोग चल रहा है ! कंप्यूटर विशेषज्ञ इस तथ्य से सहमत है कि यदि संस्कृत को कंप्यूटर की डिजिटल भाषा में प्रयोग करने की तकनीक खोजी  जा सके तो भाषा जगत के साथ-साथ कंप्यूटर क्षेत्र में भी अभूतपूर्व परिवर्तन देखें जा सकते हैं ! जिस दिन यह परिकल्पना साकार एवं मूर्तरूप लेगी, एक नए युग का उदय होगा ! संस्कृत उदीयमान भविष्य की एक महत्वपूर्ण धरोहर है !
अपने देश में संस्कृत भाषा वैदिक भाषा बनकर सिमट गयी है ! इसे विद्वानों एवं विशेषज्ञों कि भाषा मानकर इससे परहेज किया जाता है ! किसी अन्य भाषा कि तुलना में इस भाषा को महत्त्व ही नहीं दिया गया , क्योंकि वर्तमान व्यावसायिक युग में उस भाषा को ही वरीयता दी  जाती है जिसका व्यासायिक मूल्य सर्वोपरि होता है ! कर्मकांड के क्षेत्र में इसे महत्त्व तो मिला है, परन्तु कर्मकांड कि वैज्ञानिकता का लोप हो जाने से इसे अन्धविश्वास मानकर संतोष कर लिया जाता है और इसका दुष्प्रभाव संस्कृत पर पड़ता है ! यदि इसके महत्त्व को समझकर इसका प्रयोग किया जाये तो इसके अगणित लाभ हो सकते हैं !
संस्कृत की भाषा विशिष्टता को समझकर लन्दन के बीच बनी एक पाठशाला ने अपने जूनियर डिविजन  में इसकी शिक्षा को अनिवार्य बना दिया है ! श्री आदित्य घोष ने सन्डे हिंदुस्तान  टाइम्स    ( १० फरवरी, २००८ ) में इससे सम्बंधित एक लेख प्रकाशित किया था ! उनके अनुसार लन्दन की उपर्युक्त पाठशाला के अधिकारीयों की यह मान्यता है कि संस्कृत का ज्ञान होने से अन्य भाषाओँ को सिखने व समझने की शक्ति में अभिवृद्धि होती है ! इसको सिखने से गणित व विज्ञान को समझने में आसानी होती है !   Saint James Independent school नामक यह विद्यालय लन्दन के कैनिंगस्टन ओलंपिया क्षेत्र की डेसर्स स्ट्रीट में अवस्थित है ! पाँच से दस वर्ष तक की आयु के इसके अधिकांश छात्र काकेशियन है ! इस विद्यालय की आरंभिक  कक्षाओं  में  संस्कृत अनिवार्य विषय के रूप में सम्मिलित है !
इस विद्यालय के बच्चे अपनी पाठ्य पुस्तक के रुप में रामायण को पढ़ते हैं ! बोर्ड पर सुन्दर देवनागरी लिपि के अक्षर शोभायमान होते हैं ! बच्चे अपने शिक्षकों से संस्कृत में प्रश्नोत्तरी करते हैं और अधिकतर समय संस्कृत में ही वार्तालाप करते हैं ! कक्षा के उपरांत समवेत स्वर में श्लोकों का पाठ भी करते हैं ! दृश्य ऐसा होता है मानो यह पाठशाला वाराणसी एवं हरिद्वार के कसीस स्थान पर अवस्थित  हो और वहां पर किसी कर्मकांड का पाठ चल रहा हो ! इस पाठशाला के शिक्षकों ने अनेक शोध-परीक्षण करने के पश्चात् अपने निष्कर्ष में पाया कि संस्कृत  का ज्ञान बच्चों के सर्वांगीण विकास में सहायक होता है ! संस्कृत जानने वाला छात्र अन्य  भाषाओँ के साथ अन्य  विषय भी शीघ्रता से सीख जाता है ! यह निष्कर्ष उस विद्यालय के विगत बारह वर्ष के अनुभव से प्राप्त हुआ है !
Oxford University से संस्कृत में Ph.D करने वाले डॉक्टर वारविक जोसफ उपर्युक्त विद्यालय के संस्कृत विभाग के अध्यक्ष हैं ! उनके अथक लगन ने संस्कृत भाषा को इस विद्यालय के ८०० विद्यार्थियों के जीवन का अंग बना दिया है ! डॉक्टर जोसफ के अनुसार संस्कृत विश्व की सर्वाधिक पूर्ण, परिमार्जित एवं तर्कसंगत भाषा है ! यह एकमात्र ऐसी भासा है जिसका नाम उसे बोलने वालों के नाम पर आधारित नहीं है ! वरन संस्कृत शब्द का अर्थ ही है “पूर्ण भाषा ” ! इस विद्यालय के प्रधानाध्यापक पॉल मौस का कहना है कि संस्कृत अधिकांश यूरोपीय और भारतीय भाषाओँ की जननी है ! वे संस्कृत से अत्यधिक प्रभावित है ! प्रधानाचार्य ने बताया कि प्रारंभ  में संस्कृत को अपने पाठ्यक्रम का अंग बनाने के लिए बड़ी चुनौती झेलनी पड़ी थी !
प्रधानाचार्य मौस ने अपने दीर्घकाल के अनुभव के आधार पर बताया कि संस्कृत सिखने से अन्य लाभ भी हैं ! देवनागरी लिपि लिखने से तथा संस्कृत बोलने से बच्चों की जिह्वा तथा उँगलियों का कडापन समाप्त हो जाता है और उनमें लचीलापन आ जाता है ! यूरोपीय भाषाएँ बोलने से और  लिखने से जिह्वा एवं उँगलियों के कुछ भाग सक्रिय नहीं होते है ! जबकि संस्कृत के प्रयोग से इन अंगों के अधिक भाग सक्रिय होते हैं ! संस्कृत अपनी विशिष्ट ध्वन्यात्मकता के कारण प्रमस्तिष्कीय (Cerebral) क्षमता में वृद्धि करती है ! इससे सिखने की क्षमता , स्मरंशक्ति, निर्णयक्षमता में आश्चर्यजनक अभिवृद्धि होती है ! संभवतः यही कारण है कि पहले बच्चों का विद्यारम्भ संस्कार कराया जाता था और उसमें मंत्र लेखन के साथ बच्चे को जप करने के लिए भी प्रोत्साहित किया जाता था ! संस्कृत से छात्रों की गतिदायक कुशलता (Motor Skills)  भी विकसित होती है !