बिनु सत्संग विवेक न होई| राम कृपा बिनु सुलभ न सोई||
सतसंगत मुद मंगल मूला| सोई फल सिधि सब साधन फूला||
सत्संग के बिना मनुष्य का विवेक जाग्रत नहीं होता और सत्संग श्री राम जी की कृपा के बिना नहीं मिलता है। संतों की संगति आनंद और कल्याण का मुख्य मार्ग है, संतों की संगति ही परम-सिद्धि का फल है और सभी साधन तो फूल के समान है।
भगवान की कृपा निष्काम भाव से कर्तव्य समझ कर कर्म करने से प्राप्त होती है। इसलिये मनुष्य को संसार में भगवान की कृपा प्राप्त करने के लिये ही कर्म करना चाहिये। मनुष्य का संसार में विश्वास पतन का कारण होता है, और ईश्वर में विश्वास शाश्वत-सुख और परम-शान्ति का कारण होता है। हम किसी का कहना मानें यह हमारे वश की बात है, कोई हमारा कहना मानें यह हमारे वश की बात नहीं होती है। इसी प्रकार किसी को सुख देना हमारे हाथ में होता है परन्तु किसी से सुख पाना हमारे हाथ में नहीं होता है। जो हमारे हाथ की बात है, उसे करना ही स्वयं का उद्धार का कारण होती है, और जो हमारे हाथ की बात नहीं है उसे करना स्वयं के पतन का कारण होती है।
यदि हमें परमात्मा की तरफ चलना है तो हमें सांसारिक सुख अच्छे नहीं लगने चाहिए। जब हम पिछले कदम को छोड़ते हैं तभी हम आगे चल पाते हैं, जैसे-जैसे हम पिछले कदमों को छोड़ते जाते हैं उतने ही आगे बढ़ते चले जाते हैं। इस प्रकार से आगे बढ़ते रहने से एक दिन मंज़िल पर पहुँच ही जायेंगे। यदि हम पिछले कदम को छोड़ेंगे नहीं तो आगे नही बढ़ सकते हैं इसी प्रकार हम सांसारिक सुख को छोड़ने की इच्छा करेंगे तभी परमात्मा का आनन्द प्राप्त कर पायेंगे। दो नावों में सवार होकर नहीं चला जा सकता है। एक संसार रूपी भौतिक नाव है, दूसरी परमात्मा रूपी आध्यात्मिक नाव है। जब तक संसार रूपी नाव से नहीं उतरोगे तब तक परमात्मा रूपी नाव पर सवार कैसे हो सकते हैं?
जब संसार के लोग हमारा आदर करते है तो हमें समझना चाहिये कि हमारे ऊपर भगवान की कृपा है। वह हमारा आदर नहीं कर रहें हैं वह तो भगवान का आदर कर रहें होते हैं। जिस प्रकार किसी पद पर आसीन व्यक्ति को कोई सलाम करता है तो वह सलाम उस व्यक्ति के लिये न होकर उस पद के लिये होता है। हमारा आदर तो केवल भगवान ही कर सकते है।
संसार में जब तक किसी व्यक्ति का स्वार्थ नहीं होता है तब तक वह किसी का भी आदर नहीं कर सकता है। आज तक का इतिहास उठाकर देख लो इस संसार से कभी कोई तृप्त नही हुआ है। जो वस्तु जिसके पास अधिक है उसको उसकी उतनी ही अधिक ज़रुरत रहती है। जिसके पास धन अधिक है, उसको और अधिक धन पाने की इच्छा होती है। जिस निर्धन व्यक्ति के पास रुपये नहीं है उसको पचास, सौ रुपये मिल जायेगें तो समझेगा कि बहुत मिल गया लेकिन जो जितना धनवान व्यक्ति होता है उसकी भूख उस निर्धन व्यक्ति से अधिक होती है।
संसार में हमें सुख-सम्पत्ति का त्याग नहीं करना है, परन्तु सुख-सम्पत्ति को पाने की इच्छा का त्याग करना चाहिये।
यह इच्छा ही तो हमारे पतन का कारण बनती आयी है। ज्ञान के द्वारा ही संसार का त्याग हो सकता है और सम्पूर्ण विश्वास के साथ ही परमात्मा से प्रेम हो सकता है। जिनसे भी हमारा संसारिक संबन्ध है उन सभी का हमारे ऊपर पूर्व जन्मों का कर्जा है, उन सभी का कर्जा चुकाने के लिये ही तो यह शरीर मिला है। कर्जा तो हम चुकता करते हैं लेकिन साथ ही नया कर्जा हम फिर से चढ़ा लेते हैं। जब तक हम कर्जदार रहेंगे तो मुक्त कैसे हो सकते हैं। यह तभी संभव हो सकेगा जब कि हम इस संसार से नया कर्जा नहीं लेंगे। संसार तो केवल हमसे वस्तु ही चाहता है, हमारे को कोई नहीं चाहता है।
हम सभी के ऊपर मुख्य रूप से दो प्रकार का ही कर्जा है, एक शरीर जो प्रकृति का कर्जा है, दूसरा आत्मा जो परमात्मा का कर्जा है।
इसलिये हमें संसार से किसी भी वस्तु को पाने की इच्छा का त्याग कर देना चाहिये और शरीर सहित जो कुछ भी सांसारिक वस्तु हमारे पास है उसे सहज मन-भाव से संसार को ही सोंपना देनी चाहिये। हम स्वयं आत्मा स्वरूप परमात्मा के अंश हैं इसलिये स्वयं को सहज मन-भाव से परमात्मा को सोंप चाहिये यानि भगवान के प्रति मन से, वाणी से और कर्म से पूर्ण समर्पण कर देना चाहिये।
यही मानव जीवन का एक मात्र उद्देश्य है। यही मनुष्य जीवन का एक मात्र लक्ष्य है। यही मानव जीवन की परमसिद्धि है। यही वास्तविक मुक्ति है। यह मुक्ति शरीर रहते हुए ही प्राप्त होती है। इसलिये यह मनुष्य जन्म अत्यन्त दुर्लभ है।
*जय श्री राधे*
*पं. मंगलेश्वर त्रिपाठी*
*धर्मार्थ वार्ता समाधान संघ*
Sunday, August 28, 2016
बिनु सत्संग विवेक न होई
संसार में प्रत्येक व्यक्ति ज्ञानी है
संसार में प्रत्येक व्यक्ति ज्ञानी है, प्रत्येक व्यक्ति ज्ञान चाहता है, प्रत्येक व्यक्ति अपने को ज्ञानी समझता है, इसीलिये ज्ञान को नहीं प्राप्त कर पाता है। क्योंकि ज्ञानी को ज्ञान की क्या आवश्यकता है, ज्ञान की आवश्यकता तो अज्ञानी को होती है, जो व्यक्ति अपने को अज्ञानी समझता है उसे ही ज्ञान की प्राप्ति हो पाती है।
संसार में प्रत्येक व्यक्ति भक्त है, प्रत्येक व्यक्ति भक्ति चाहता है, प्रत्येक व्यक्ति अपने को भक्त समझता है, इसीलिये भक्ति को प्राप्त नहीं कर पाता है। क्योंकि भक्त को भक्ति की क्या आवश्यकता है, भक्ति की आवश्यकता तो अभक्त को होती है, जो व्यक्ति अपने को अभक्त समझता है उसे ही भक्ति प्राप्त हो पाती है।
बिना ज्ञान के भक्ति नहीं हो सकती है, बिना भक्ति के ज्ञान नहीं हो सकता है, ज्ञान से भक्ति प्राप्त हो या भक्ति से ज्ञान प्राप्त हो एक ही बात है। ज्ञान और भक्ति दोनों ही एक दूसरे के बिना अधूरे हैं, जब तक दोनों बराबर मात्रा में स्वयं के अन्दर प्रकट नहीं हो जाते तब तक कोई भी व्यक्ति कर्म के बंधन से मुक्त नहीं हो सकता है। जब तक व्यक्ति कर्म बंधन से मुक्त नहीं होता है तब तक भगवान का दर्शन प्राप्त नहीं हो सकता है।
भक्ति के पास आँखे नहीं होती है और ज्ञान के पास पैर नहीं होते हैं, भगवत पथ पर भक्ति ज्ञान की आँखो की सहायता से देख पाती है और ज्ञान भक्ति के पैरों की सहायता से चल पाता है। जब तक ज्ञान और भक्ति साथ-साथ नहीं चलते हैं तब तक भगवत पथ की दूरी तय नहीं हो सकती है।
ज्ञानी व्यक्ति को कभी ज्ञान को श्रेष्ठ नहीं समझना चाहिये और भक्त को कभी भक्ति को श्रेष्ठ नहीं समझना चाहिये, प्रत्येक व्यक्ति में ज्ञान और भक्ति दोनों ही सम्पूर्ण मात्रा में होते हैं। किसी व्यक्ति में ज्ञान अधिक प्रकट होता है तो किसी व्यक्ति में भक्ति अधिक प्रकट होती है, मिलकर दोनों का आदान-प्रदान करना चाहिये।
अधिकतर पुरुषों में ज्ञान की अधिकता प्रकट रहती है और अधिकतर स्त्रीयों में भक्ति की अधिकता प्रकट रहती है, जिस प्रकार स्त्री और पुरुष एक दूसरे के बिना अधूरे हैं उसी प्रकार ज्ञान और भक्ति एक दूसरे के बिना अधूरे हैं। इसीलिये भक्त की संगति मिले तो स्वयं को अभक्त समझते हुए भक्तों की संगति करनी चाहिये और यदि ज्ञानी की संगति मिले तो स्वयं को अज्ञानी समझते हुए ज्ञानीयों की संगति करनी चाहिये।
भक्त और ज्ञानी दोनों को किसी से भी बहस नहीं करनी चाहिये, यदि कोई कुछ भी पूछे तो उसे ज्ञानी समझते हुए और स्वयं को अज्ञानी समझते हुए जबाब दे देना चाहिए। जबाब देने के बाद यह विचार भी नहीं करना चाहिये कि मैने क्या जबाब दिया है, क्योंकि विचार करने से उसके परिणाम का विचार मन में उत्पन्न हो जाता है, फल का विचार ही तो बंधन का कारण होता है।
सामने वाला तो बहस करेगा लेकिन उससे विचलित नहीं होना चाहिये बल्कि अपनी समझ के अनुसार शान्त चित्त से जबाब देना चाहिये। जब ऎसा महसूस होने लगे कि सामने वाला व्यक्ति बात को समझ नहीं रहा है तो उससे विनम्रता पूर्वक क्षमा माँगते हुए, मैं तो अज्ञानी हूँ ऐसा कहकर उससे अपना पीछा छुड़ा लेना चाहिये।
*जय श्री राधे*
*पं. मंगलेश्वर त्रिपाठी*
*धर्मार्थ वार्ता समाधान संघ*
सभी जीव संसार रूपी कारागार में ही जन्म लेते हैं
सभी जीव संसार रूपी कारागार में ही जन्म लेते हैं, जन्म लेकर गोकुल रूपी शरीर में प्रवेश करते हैं, और जिस जीव का नन्द रूपी मन होता है तो उसी के आंगन में महामाया रूपी कन्या के स्थान पर आनन्द स्वरूप श्री स्वयं कृष्ण प्रकट हो जाते हैं। प्रत्येक मनुष्य को इस आनन्द की यशौदा रूपी यश और वात्सल्य रूपी कर्तव्य के द्वारा निरन्तर ध्यान रख कर परवरिश करनी होती है तब यह आनन्द धीरे-धीरे बड़ा होता है।
सबसे पहले यह पूतना रूपी अविध्या का उद्धार करता है, और बड़ा होने पर काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह, मत्सर आदि रूपी असुरों का उद्धार करता है और साथ ही धैर्य, क्षमा, सरलता, संकल्प, सत्य आदि गोप सखाओं के साथ वह हमारी देहात्म बुद्धि रूपी मटकी को फोड़कर भाव रूपी मक्खन को चुरा लेता है, यही वास्तविक मक्खन मेरे कृष्णा को प्रिय है।
इसी मक्खन को खिलाने के लिये गोपी रूपी हम सभी जीवात्मायें उस कृष्णा को खिलाने के लिये लालायित रहतीं हैं। जिस गोपी का यह भाव रूपी मक्खन शुद्ध होता है केवल उसी के मक्खन की वह चोरी करता है। जब तक किसी गोपी का यह मक्खन वह चुराता नहीं है तब तक वह गोपी पूर्ण तृप्त नहीं होती है।
उस तृप्त गोपी रूपी संत का शब्द रूपी मक्खन का प्रसाद जिस किसी को भी प्राप्त होता है यदि वह उस प्रसाद को जो ग्रहण कर लेता है तो उसका भी स्वभाव मक्खन के समान शुद्ध होता है, यही मनुष्य जीवन की सम्पूर्णता है, इस कृष्ण रूपी आनन्द को प्राप्त करके इस संसार रूपी कारागार में पुन: नहीं आना पड़ेगा।
जब तक बुद्धि के द्वारा मन और वाणी से मनुष्य का कर्म एक नहीं हो जाता तब तक मन शुद्ध नहीं होता है। जब तक मन शुद्ध नहीं हो जाता तब तक आनन्द प्रकट नहीं हो सकता है। आनन्द प्रकट हुये बिना भगवान की शुद्ध भक्ति नहीं हो सकती है इसलिये हमें स्वयं के मन को ही जानने का प्रयत्न करना चाहिये कि मेरा मन क्या चिंतन कर रहा है।
यदि भगवान का चिंतन नहीं हो रहा है तो संसार का चिंतन हो रहा होगा, संसार के चिंतन से मनुष्य का मन अशुद्ध बना रहता है और भगवान के चिंतन से मन शुद्ध हो जाता है। इसलिये स्वयं के मन को पहिचानने का प्रयत्न करना चाहिये। यह तभी संभव है जब तक हम दूसरों के मन को जानना बन्द नहीं करेंगे।
हम तभी जान पायेंगे कि हमारे अन्दर कौन सा चिंतन चल रहा है। यदि किसी के मन में संसार का चिंतन चल रहा है तो आज से ही भगवान का चिंतन का अभ्यास प्रारम्भ कर देना। क्रम-क्रम से चलकर अभ्यास करने से असंभव कुछ भी नहीं रह जाता है।
अभ्यास की विधि:-
चलते-फिरते, खाते-पीते, सोते-जागते अपने सभी कर्तव्य कार्यों को करते हुए प्रभु के किसी भी नाम का जाप और रूप का समरण करते रहना चाहिये, किसी भी कर्तव्य कर्म का त्याग कभी नहीं करना चाहिये। कर्तव्य पालन ही धर्माचरण कहलाता है।
प्रभु के किसी भी छोटे से छोटा नाम का जप करना आसान होता है, जैसे राधे-राधे, राम-राम, श्याम-श्याम, इन महामन्त्रों का जाप करना चाहिये, इसे जपने के लिये किसी भी गुरु से मन्त्र-दीक्षा लेने की आवश्यकता नहीं होती है क्योंकि यह स्वयं सिद्ध मन्त्र है।
हरे कृष्णा हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
इस प्रकार निरन्तर अभ्यास के द्वारा आपके यहाँ भी आनन्द प्रकट हो जायेगा।
*जय श्री राधे*
*पं. मंगलेश्वर त्रिपाठी*
"धर्मार्थ वार्ता समाधान संघ"
भगवान ने हमें समस्त भौतिक कर्मों को करने के लिये तीन वस्तु दी हैं
भगवान ने हमें समस्त भौतिक कर्मों को करने के लिये तीन वस्तु दी हैं, (१) बुद्धि, (२) मन और (३) इन्द्रियों का समूह यह शरीर। बुद्धि के द्वारा हमें जानना होता है, मन के द्वारा हमें मानना होता है और इन्द्रियों के द्वारा हमें करना होता है।
इसके लिये पहले इच्छा और कामना का भेद समझना होगा, कामनाओं का जन्म बुद्धि के द्वारा होता है, और इच्छाओं का जन्म मन में होता है। बुद्धि का वास स्थान मष्तिष्क होता है और मन का वास स्थान हृदय होता है, बुद्धि विषयों की ओर आकर्षित होकर कामनाओं को उत्पन्न करती हैं और इच्छायें प्रारब्ध के कारण मन में उत्पन्न होती हैं। कामना जीवन में कभी पूर्ण नहीं होती है, इच्छा हमेशा पूर्ण होती हैं।
बुद्धि के अन्दर विवेक होता है, यह विवेक केवल मनुष्यों में ही होता है, अन्य किसी योनि में नहीं होता है। यह विवेक हंस के समान होता है। इस विवेक रूपी हंस के द्वारा "जल मिश्रित दूध" के समान "शरीर मिश्रित आत्मा" में से जल रूपी शरीर और दूध रूपी आत्मा का अलग-अलग अनुभव किया जाता है, जो जीव आत्मा और शरीर का अलग-अलग अनुभव कर लेता है तो वह जीव केवल दूध रूपी आत्मा का ही रस पान करके तृप्त हो जाता है और शरीर रूपी जल की आसक्ति का त्याग करके वह निरन्तर आत्मा में ही स्थित होकर परम आनन्द का अनुभव करता है।
मनुष्य शरीर रथ के समान है, इस रथ में घोडे रूपी इन्द्रियाँ हैं, लगाम रूपी मन है, सारथी रूपी बुद्धि है और रथ के दो स्वामी जीव कर्ता-भाव में अहंकार से ग्रसित रहता है और आत्मा द्रृष्टा-भाव में मुक्त रहता है। जब तक जीव का विवेक सुप्त अवस्था में रहता है तब तक जीव स्वयं को कर्ता समझकर शरीर रूपी रथ के इन्द्रियों रूपी घोड़ो को मन रूपी लगाम से बुद्धि रूपी सारथी के द्वारा चलाता रहता है, तो जीव कर्म के बंधन में फंसकर कर्म के अनुसार सुख-दुख भोगता रहता है।
बिनु सत्संग विवेक न होई| राम कृपा बिनु सुलभ न सोई||
जब जीव का विवेक भगवान की कृपा से सत्संग के द्वारा जाग्रत होता है तब जीव मन रुपी लगाम को बुद्धि रुपी सारथी सहित आत्मा को सोंप देता है तब जीव अकर्ता भाव में द्रृष्टा-भाव में स्थित होकर मुक्त हो जाता है।
जब तक जीव के शरीर रूपी रथ का बुद्धि रूपी सारथी मन रुपी लगाम को खींचकर नही रखता है तो इन्द्रियाँ रुपी घोंडे अनियन्त्रित रूप से विषयों की ओर आकर्षित होकर शरीर रुपी इस रथ को दौड़ाते ही रहते हैं, और अधिक दौड़ने के कारण शरीर रुपी रथ शीघ्र थककर चलने की स्थिति में नही रह जाता है फिर एक दिन काल के रूप में एक हवा का झोंका आता है और जीव को पुराने रथ से उड़ाकर नये रथ पर ले जाता है।
आत्मा ही जीव का परम मित्र है, वह जीव को कभी भी अकेला नहीं छोड़ता है, वही जीव का वास्तविक हितैशी है, इसलिये वह भी जीव के साथ नये रथ पर चला जाता है। यह क्रम तब तक चलता रहता है जब तक जीव स्वभाव द्वारा बुद्धि सहित मन को आत्मा को नहीं सोंप देता है।
मन चंचल कभी नहीं होता है, बुद्धि चंचल होती है, बुद्धि की चंचलता के कारण ही मन चंचल प्रतीत होता है। क्योंकि मन बुद्धि के वश में होता है बुद्धि मन को अपने अनुसार चलाती है तो बुद्धि की आज्ञा मान कर मन उधर की ओर चल देता है, हम समझतें हैं मन चंचल है।
जिस प्रकार कोई कोई पति अपनी पत्नी के पूर्ण आधीन होता है तो वह जोरु का गुलाम कहलाता हैं, और जब पत्नी अपने पति के पूर्ण आधीन रहती है तो वह पतिव्रता स्त्री कहलाती है, ठीक उसी प्रकार बुद्धि पत्नी (स्त्रीलिंग) स्वरूपा है और मन (पुल्लिंग) पति स्वरूप है, जब मन, बुद्धि के आधीन होता है तो वह जोरु के गुलाम की तरह नाचता रहता है, और जब बुद्धि स्वयं मन के आधीन हो जाती है तो वह स्थिर हो जाती है तो मन भी स्थिर हो जाता है|
मनुष्य को अपने मन रूपी दूध का बुद्धि की मथानी बनाकर काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि असुरों और धैर्य, क्षमा, सरलता, संकल्प, सत्य आदि देवताओं द्वारा अहंकार की डोरी से मथकर भाव रूपी मक्खन का भोग प्रभु को लगाना चाहिये। यही माखन मेरे कृष्णा को अत्यन्त पसन्द है। जो छाछ बचेगी वह मेरा कान्हा आपसे स्वयं माँग कर खुद ही पी लेगा, मन रूपी दूध का कोई भी अंश नहीं शेष नहीं रहता है। यही मनुष्य जीवन की सर्वोच्च सिद्धि है।
आरती राग में गाने का कारण
आरती राग में गाने का कारण
हमारी प्राचीन परंपरा के अनुसार भगवान को प्रसन्न करने के लिए आरती की जाती है और ये आरती राग में गाई जाती हैं। आरती राग में ही क्यों गाई जाती हैं? इसके पीछे धार्मिक कारण तो है साथ ही इसका वैज्ञानिक कारण भी है। आरती राग में करने के पीछे धार्मिक कारण यही है कि संगीतमय आरती भगवान को भी प्रसन्न कर देती है। सहीसंगीत हर स्थिति में मन को सुकून देने वाला ही होता है। हमारे धर्म ग्रंथों में कई प्रसंग ऐसे आते हैं जहाँ भगवान की प्रार्थना में विभिन्न वाद्ययंत्रों के साथ-साथ उनकी स्तुति को सही सुर में गाया जाता है। ऐसे स्तुति गान से देवी-देवता तुरंत ही प्रसन्न हो जाते हैं। ऐसा माना जाता है। प्रतिदिन प्रात: काल सही सुर-ताल के साथ आरती करना हमारे स्वास्थ्य के लिए भी लाभदायक है। सही सुर में गायन करने से हमारे शरीर का पूरा सिस्टम प्रभावित होता है। हमें ऊर्जा मिलती है, रक्त संचार बढ़ जाता है। आरती गान को योगा की तरह ही देखा जा सकता है। इससे हमारी आवाज़ साफ़ और सुरीली हो जाती है। नियमित आरती करने वाले लोगों की आवाज़ में अलग ही आकर्षण पैदा हो जाता है। साथ ही गले से संबंधित कई रोग हमेशा दूर ही रहते हैं। इनके अलावा भी कई अन्य स्वास्थ्य संबंधी लाभ हैं।
कार्य हमेशा तीन प्रकार से मन
कार्य हमेशा तीन प्रकार से मन, वाणी और शरीर के द्वारा ही किये जाते है, किसी भी कार्य को करते समय "कब हम अज्ञानी होते हैं और कब ज्ञानी होते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं....
त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः।
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किंचित्करोति सः॥
(गीता ४/२०)
जो मनुष्य अपने सभी कर्म-फलों की आसक्ति का त्याग करके सदैव सन्तुष्ट तथा स्वतन्त्र रहकर सभी कार्यों में पूर्ण व्यस्त होते हुए भी वह मनुष्य निश्चित रूप से कुछ भी नहीं करता है।
१. जब हम स्वयं के सुख की कामना करते हैं तब हम अज्ञानी होते हैं, और जब हम दूसरों के सुख की कामना करते हैं तब हम ज्ञानी होते हैं।
२. जब हम दूसरों को जानने का प्रयत्न करते हैं तब हम अज्ञानी होते हैं, और जब हम स्वयं को जानने का प्रयत्न करते हैं तब हम ज्ञानी होते हैं।
३. जब हम स्वयं को कर्ता मानकर कार्य करते हैं तब हम अज्ञानी होते हैं, और जब हम भगवान को कर्ता मानकर कार्य करते हैं तब हम ज्ञानी होते हैं।
४. जब हम दूसरो को समझाने का प्रयत्न करते हैं तब हम अज्ञानी होते हैं, और जब हम स्वयं को समझाने का प्रयत्न करते हैं तब हम ज्ञानी होते हैं।
५. जब हम दूसरों के कार्यों को देखने का प्रयत्न करते हैं तब हम अज्ञानी होते हैं, और जब हम स्वयं के कार्यों को देखने का प्रयत्न करते हैं तब हम ज्ञानी होते हैं।
६. जब हम दूसरों को समझाने के भाव से कुछ भी कहते या लिखते हैं तब हम अज्ञानी होते हैं, और जब हम स्वयं के समझने के भाव से कहते या लिखते हैं तब हम ज्ञानी होते हैं।
७. जब हम संसार की सभी वस्तुओं को अपनी समझकर स्वयं के लिये उपभोग करते हैं तब हम अज्ञानी होते हैं, और जब हम संसार की सभी वस्तुओं को भगवान की समझकर भगवान के लिये उपयोग करते हैं तब हम ज्ञानी होते हैं।
ज्ञानी अवस्था में किये गये सभी कार्य भगवान की भक्ति कार्य ही होते हैं।
"पं. मंगलेश्वर त्रिपाठी"
"धर्मार्थ वार्ता समाधान संघ"
Wednesday, August 24, 2016
कार्य हमेशा तीन प्रकार से मन
कार्य हमेशा तीन प्रकार से मन, वाणी और शरीर के द्वारा ही किये जाते है, किसी भी कार्य को करते समय "कब हम अज्ञानी होते हैं और कब ज्ञानी होते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं....
त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः।
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किंचित्करोति सः॥
(गीता ४/२०)
जो मनुष्य अपने सभी कर्म-फलों की आसक्ति का त्याग करके सदैव सन्तुष्ट तथा स्वतन्त्र रहकर सभी कार्यों में पूर्ण व्यस्त होते हुए भी वह मनुष्य निश्चित रूप से कुछ भी नहीं करता है।
१. जब हम स्वयं के सुख की कामना करते हैं तब हम अज्ञानी होते हैं, और जब हम दूसरों के सुख की कामना करते हैं तब हम ज्ञानी होते हैं।
२. जब हम दूसरों को जानने का प्रयत्न करते हैं तब हम अज्ञानी होते हैं, और जब हम स्वयं को जानने का प्रयत्न करते हैं तब हम ज्ञानी होते हैं।
३. जब हम स्वयं को कर्ता मानकर कार्य करते हैं तब हम अज्ञानी होते हैं, और जब हम भगवान को कर्ता मानकर कार्य करते हैं तब हम ज्ञानी होते हैं।
४. जब हम दूसरो को समझाने का प्रयत्न करते हैं तब हम अज्ञानी होते हैं, और जब हम स्वयं को समझाने का प्रयत्न करते हैं तब हम ज्ञानी होते हैं।
५. जब हम दूसरों के कार्यों को देखने का प्रयत्न करते हैं तब हम अज्ञानी होते हैं, और जब हम स्वयं के कार्यों को देखने का प्रयत्न करते हैं तब हम ज्ञानी होते हैं।
६. जब हम दूसरों को समझाने के भाव से कुछ भी कहते या लिखते हैं तब हम अज्ञानी होते हैं, और जब हम स्वयं के समझने के भाव से कहते या लिखते हैं तब हम ज्ञानी होते हैं।
७. जब हम संसार की सभी वस्तुओं को अपनी समझकर स्वयं के लिये उपभोग करते हैं तब हम अज्ञानी होते हैं, और जब हम संसार की सभी वस्तुओं को भगवान की समझकर भगवान के लिये उपयोग करते हैं तब हम ज्ञानी होते हैं।
ज्ञानी अवस्था में किये गये सभी कार्य भगवान की भक्ति कार्य ही होते हैं।
"पं. मंगलेश्वर त्रिपाठी"
"धर्मार्थ वार्ता समाधान संघ"