Thursday, February 11, 2016

।।जीव की सत्तायें।।
ऐसा कहा गया है कि जगत ब्रह्म का विवर्त है, अर्थात् अविद्या के कारण आभास मात्र है। अविद्या को ज्ञान का अभाव मात्र नहीं समझना चाहिए। वह भाव तो नहीं है, परन्तु भाव रूप है-भाव और अभाव दोनों से भिन्न अनिर्वचनीय है। भाव से भिन्न इसलिए है कि उसका बोध होता है, तथा अभाव से भिन्न इसलिए कि इसके कारण मिथ्या वस्तु दिखाई पड़ती है, जैसे रज्जु के स्थान पर सर्पाभास। इसलिए कहा गया है कि अविद्या की दो शक्तियां हैं- आवरण और विक्षेप। विक्षेप शक्ति मिथ्या सर्प का सृजन करती है और आवरण शक्ति सर्प के द्वारा रज्जु का आवरण करती है। इसी से रज्जु अज्ञान की अवस्था में सर्वपत् दिखाई पड़ती है। इसी प्रकार ब्रह्म भी अज्ञान के कारण जगतवत् दिखाई पड़ता है। अत: वेदान्त में तीन सत्ताएं स्वीकृत की गई हैं-

प्रातिभासिक (सर्प) - जो हमारे साधारण भ्रम की स्थिति में आभासित होता है और रस्सी के ज्ञान के बाधित होता है।
व्यावहारिक (जगत) - जो मिथ्या तो है परन्तु, जब तक ब्रह्म का ज्ञान नहीं हो जाता, तब तक सत्य प्रतीत होता है, और ज्ञान हो जाने पर बाधित हो जाता है।
ब्रह्म - जिसे पारमार्थिक कहा जाता है। इसका कभी भी ज्ञान नहीं होता है। यह नित्य है। ब्रह्मज्ञान होने से जगत का बोध हो जाता है और मुक्ति प्राप्त हो जाती है।
जीव वास्तव में ब्रह्म ही है, दूसरा कुछ नहीं, शरीर धारण के कारण वह भिन्न प्रतीत होता है। शरीर तीन प्रकार का होता है- स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर। अनादि प्रवाह के अधीन होकर कर्मफल को भोगने के लिए शरीर धारण करना पड़ता है। कर्म अविद्या के कारण होते हैं। अत: शरीर धारण अविद्या के ही कारण है। इसे ही बंधन कहते हैं। अविद्या के कारण कर्तृत्वाभिमान और भोक्तृत्वाभिमान पैदा होता है, जो आत्मा में स्वभावत: नहीं होता। जब कर्तृत्वाभिमान और भोक्तृत्वाभिमान से युक्त होता है, तब आत्मा जीव कहलाता है।

: कल्पितमासनं हिमजलै: च दिव्याम्बरं
नाना रत्न विभूशोत्न मृग मादा मो दान्कितं चंदनम!
जातीचम्पकबिल्वपत्ररचितं पुष्पं च धूपं तथा
दीपं देव दयानिधे पशुपते हृकल्पितं गृह्याताम !!१!!
हे दयानिधे! हे पशुपति! हे देव! यह रत्न निर्मित सिंहासन, शीतल जल से स्नान, नाना रत्नावलि विभूषित दिव्य वस्त्र, कस्तूरिकागन्धसमन्वित चन्दन, जूही, चम्पा और मानसिक [ पूजोपहार] ग्रहण कीजिये!
सौवर्णे नव रत्न खण्ड रचिते पात्रे घृतं पायसं
भक्ष्यं पञ्चविधं पयोदधियुतं रम्भा फलं पानकम !
शाकानामयुतं जलं रुचिकरं कपूर्र खण्डोज्जवलं
ताम्बूलं मनसा मया विरचितं भक्त्या प्रभु स्वीकुरु!!२!!
मैंने नवीन रत्न खण्डो से सुवर्ण पात्र में घृत यक्त खीर, दूध और दधिसहित पांच प्रकार का व्यंजन, कदलीफल, शरबत, अनेकों शाक, कप्पुर से सुवासित और स्वच्छ किया हुआ मीठा जल और ताम्बूल–ये सब मनके द्वारा ही बनाकर प्रस्तुत किये हैं, प्रभु ! कृपया इन्हें स्वीकार कीजिये !
छत्रं चामरयोर्यगं व्यजनकं चादर्शकं निर्मलं
वीणा भेरि मृदंग काहल कला गीतं च नृत्यं तथा
साष्टांग प्रणति स्तुतिर्बहुविधा ह्येत्समस्तं मया
संकल्पेन समर्पितं तव विभो पूजां गृहान प्रभु!!३!!
छात्र, दो चंवर, पंखा, निर्मल दर्पण, वीणा, भेरी, मृदंग, दुन्दुभीके वाद्य, गान और नृत्य, साष्टांग प्रणाम स्तुति—ये सब मैं संकल्प से ही आपको समर्पण करता हूँ, प्रभु! मेरी यह पूजा ग्रहण कीजिये!
आत्मा त्वं गिरिजा मति: सहचरा: प्राणा: शरीरं गृहं
पूजा ते विषयोपभोगरचना निद्रा समाधिस्थिति:!
संचार: पदयो: प्रदक्षिणविधि : स्तोत्राणि सर्वा गिरो
यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम !!४!!
हे शम्भो! मेरी आत्मा आप हैं, बुद्धि पार्वती जी हैं, प्राण आपके गण हैं, शरीर आपका मंदिर है, सम्पूर्ण विषय-भोग की रचना आपकी पूजा है, निद्रा समाधि है, मेरा चलना फिरना आपकी परिक्रमा है तथा सम्पूर्ण शब्द आपके स्तोत्र हैं, इस प्रकार मैं जो-जो भी मर्म करता हूँ, वह सब आपकी आराधना ही है!
करचरणकृतं वाक्कायजं कर्मजं वा
श्रवणनयनजं वा सर्वमेतत्क्षमस्व
जय जय करुणाब्धे श्रीमहादेव शम्भो!!५!!
प्रभु! मैंने हाथ, पैर, वाणी, शरीर, कर्म, कर्ण, नेत्र, अथवा मनसे जो भी अपराध किये हों, वे विहित हों अथवा अविहित, उन सबको आप क्षमा कीजिये! हे करुणासागर श्रीमहादेव शंकर! आपकी जय हो!
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पं आलोक त्रिपाठी :
आत्मा त्वं गिरिजा मति: सहचरा: प्राणाः शरीरं गृहं
पूजा ते विषयोपभोग रचना निद्रा समाधिस्थिति: ।
संचारः पदयोः प्रदक्षिण विधिः स्तोत्राणि सर्वा गिरा
यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनाम ।।
­अनु० 'हे शम्भो ! मेरी आत्मा तुम हो, बुद्धि माता पार्वती जी हैं, प्राण आपके गण हैं, शरीर आपका घर है, सम्पूर्ण विषय- भोग की रचना आप की पूजा है, निद्रा समाधि है, मेरे पाँवों का चलना-फिरना आप की परिक्रमा है तथा मेरी वाणी के सम्पूर्ण शब्द आप के स्तोत्र(स्तुति) हैं तथा मैं जो भी कर्म करता हूँ, वह सब आप अखिल-शिव-स्वरूप की आराधना ही है।

✒✔       🎆 भवंभवानी सहितं नमामि🎆

आत्मा त्वं गिरिजा मति: सहचरा: ,प्राणा:शरीरं गृहं पूजा ते विषयोप भोग रचना , निद्रा समाधिस्थिति: ।
संचार: पदयो: प्रदक्षिण विधि: , स्तोत्रानि सर्वा गिरो , यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधानाम ।।
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...........हे शम्भो / मेरी आत्मा तुम हो , बुद्धि माता पार्वती जी हैं ,प्राण आपके गण हैं , शरीर आपका मंदिर है, सम्पूर्ण विषय- भोग की रचना आप की पूजा है , निद्रा समाधि है , मेरा चलना -फिरना आप की परिक्रमा है तथा सम्पूर्ण शब्द आप के स्तोत्र हैं , इस प्रकार जो जो भी मैं कर्म करता हूँ, वह सब आप की आराधना ही है।

विवेकानन्द बड़े स्वप्न दृष्टा थे। उन्होंने एक ऎसे समाज की कल्पना की थी जिसमें धर्म या जाति के आधार पर मनुष्य-मनुष्य में कोई भेद न रहे। उन्होंने वेदान्त के सिद्धान्तों को इसी रूप में रखा। अध्यात्मवाद बनाम भौतिकवाद के विवाद में पड़े बिना भी यह कहा जा सकता है कि समता के सिद्धान्त का जो आधार विवेकानन्द ने दिया उससे सबल बौद्धिक आधार शायद ही ढूँढा जा सके।

विवेकानंद ओजस्वी और सारगर्भित व्याख्यानों की प्रसिद्धि विश्व भर में है। जीवन के अन्तिम दिन उन्होंने शुक्ल यजुर्वेद की व्याख्या की और कहा एक और विवेकानन्द चाहिये, यह समझने के लिये कि इस विवेकानन्द ने अब तक क्या किया है । उनके शिष्यों के अनुसार जीवन के अन्तिम दिन 4 जुलाई 1902 को भी उन्होंने अपनी ध्यान करने की दिनचर्या को नहीं बदला और प्रातः दो तीन घण्टे ध्यान किया और ध्यानावस्था में ही अपने ब्रह्मरन्ध्र को भेदकर महासमाधि ले ली।

बेलूर में गंगा तट पर चन्दन की चिता पर उनकी अंत्येष्टि की गयी। इसी गंगा तट के दूसरी ओर उनके गुरू रामकृष्ण परमहंस का सोलह वर्ष पूर्व अन्तिम संस्कार हुआ था। उनके शिष्यों और अनुयायियों ने उनकी स्मृति में वहाँ एक मन्दिर बनवाया और समूचे विश्व में विवेकानन्द तथा उनके गुरू रामकृष्ण के सन्देशों के प्रचार के लिये 130 से अधिक केन्द्रों की स्थापना की।💐💐💐🙏

🌹उठो विवेकानन्द तुम्ही तो भारत के निर्माता हो ।🌹
स्वामी विवेकानन्द का जन्म आज ही के दिन 12 जनवरी सन् 1863 को कोलकाता में हुआ था। उनके बचपन का नाम नरेन्द्रनाथ दत्त था। पिता विश्वनाथ दत्त कलकत्ता हाईकोर्ट के एक प्रसिद्ध वकील थे। विश्वनाथ दत्त पाश्चात्य सभ्यता में विश्वास रखते थे। वे अपने पुत्र नरेन्द्र को भी अँग्रेजी पढ़ाकर पाश्चात्य सभ्यता के ढर्रे पर चलाना चाहते थे। परन्तु उनकी माता भुवनेश्वरी देवी धार्मिक विचारों की महिला थीं। उनका अधिकांश समय भगवान शिव की पूजा-अर्चना में व्यतीत होता था।

नरेन्द्र की बुद्धि बचपन से ही बड़ी तीव्र थी और परमात्मा को पाने की लालसा भी प्रबल थी। इस हेतु वे पहले ब्रह्म समाज में गए परन्तु वहाँ उनके चित्त को सन्तोष नहीं हुआ। वे वेदान्त और योग को पश्चिम संस्कृति में प्रचलित करने के लिये महत्वपूर्ण योगदान देना चाहते थे।

दैवयोग से विश्वनाथ दत्त की मृत्यु हो गई। घर का भार नरेन्द्र पर आ पड़ा। घर की दशा बहुत खराब थी। अत्यन्त दरिद्रता में भी नरेन्द्र बड़े अतिथि-सेवी थे। वे स्वयं भूखे रहकर अतिथि को भोजन कराते स्वयं बाहर वर्षा में रात भर भीगते-ठिठुरते पड़े रहते और अतिथि को अपने बिस्तर पर सुला देते।

स्वामी विवेकानन्द अपना जीवन अपने गुरूदेव रामकृष्ण परमहंस को समर्पित कर चुके थे। उनके गुरूदेव का शरीर अत्यन्त रूग्ण हो गया था। गुरूदेव के शरीर-त्याग के दिनों में अपने घर और कुटुम्ब की नाजुक हालत व स्वयं के भोजन की चिन्ता किये बिना वे गुरू की सेवा में सतत संलग्न रहे।

अमरीका में हुए सर्वधर्म सभा में उन्होंने अपने पहले भाषण से ही दुनिया को भारत की आध्यात्मिक शक्ति का परिचय दिया। स्वामी विवेकानन्द के ही प्रयासों से दुनिया को गुलाम भारत के इस अनमोल खजाने का पता चला जिसके बाद पूरे विश्व में शांति पाने के लिए भारत से सीखने की होड़ शुरु हो गई।

दीक्षायें तीन प्रकार की होती हैं ।
१-स्पर्श दीक्षा
२-वैधदीक्षा
३-दृग्दीक्षा
१- स्पर्श दीक्षा –स्पर्शमात्र से जो गुरुजन शिष्य के अन्दर शक्तिपात करते हैं । वह स्पर्शदीक्षा कहलाती है । सीतारामदास
ओंकारनाथ इसी स्तर के महापुरुष थे । जिसकी कुव्डलिनी महाशक्ति का जागरण स्पर्शमात्र से उन्होंने किया था । वे अभी भी जीवित हैं और उनसे मेरा अच्छा सम्बन्ध भी है । पक्षी अपने बच्चों को चारा चुगाने के साथ ही अपने पंखों से
उनको ढकते हुए ऐसा स्पर्श करते हैं कि उन बच्चों का संवर्धन होता है ।
२- वैधदीक्षा – जब कूर्म ( कछवी ) को अण्डा देना होता है तब वह तालाब आदि से निकलकर दूर जाकर मिट्टी खोदकर उसमें अण्डे देकर ढँकने के बाद लौट आती है । तत्पश्चात् निरन्तर चिन्तन करती रहती है कि अब मेरे अण्ड इतने बढ़ गये
होंगे । उसके चिन्तन के प्रभाव से अन्यों में वृद्धि उत्तरोत्तर होती रहती है । एक दिन वह चिन्तन करती है कि अब अण्डों से बच्चे निकलने वाले हैं । वह उस स्थल पर पहुँचकर मिट्टी हटाती है और अपने बच्चों को लेकर चली आती है ।
ऐसे प्रखर मनःशक्तिसम्पन्न गुरुजन स्वप्न आदि अवस्थाओं में शिष्य के समीप पहुँचकर उसे दीक्षित कर देते हैं । ये सब कार्य इनकी संकल्पशक्ति से ही होता है । इनसे किया गया चिन्तन या स्मरणमात्र शिष्य के जीवन में महान् परिवर्तन ला देता है । ये बहुत उच्चकोटि के सिद्ध महापुरुष होते हैं । अभी भी कुछ साधक मेरे सम्बन्ध में हैं जिन पर ऐसे महापुरुषों की कृपा हुई है ।
३- दृग्दीक्षा – कुछ महापुरुष इस कोटि के होते हैं जिनकी दृष्टिमात्र से साधक में महाशक्ति का जागरण हो जाता है । ये अपने संकल्पमात्र से किसी जीव पर कृपा कर सकते हैं । इनका दृष्टिपात साधक को सबल बना देता है । भागवत में मन्दराचल पर्वत से मरे देवताओं को भगवान् ने अपने दृष्टिनिक्षेप से ही जीवित कर दिया-ऐसा वर्णन हैं । ऐसे ही महापुरुषों के विषय में कहा गया है कि वे दर्शन मात्र से पवित्र कर देते हैं–”दर्शनादेव साधवः।।”–भागवतमहापुराण
मछली अपने बच्चों को दुग्धपान तो नहीं कराती । किन्तु क्षुधा से पीड़ित बच्चे जब उसके नेत्रों के सामने आते हैं तब वह अपनी दृष्टि द्वारा ही उनका पोषण करती है ।
ऐसे ही गुरुजनों की कृपादृष्टि में आने पर साधकों का कल्याण होता रहता है ।
आज रोहिणी नक्षत्र युक्त अष्टमी है । इसलिए इसकी जयन्ती संज्ञा हो जाती है । और जन्माष्टमी तो है ही। इसलिए इस दिन व्रत और उपासना का फल द्विगुणित हो जाता है । इसलिए हमें सोल्लास इसे मनाना चाहिए ।
ध्यातव्य है कि जिसकी जन्माष्टमी मना रहे हैं । उन्होंने अपना जीवन गोसेवा से आरम्भ किया । मृत्युलोक ही नहीं अपितु स्वर्गलोक के अधिपति देवराज इन्द्र के कोप से समस्त ब्रज और गौओं की रक्षा की । जिसके कारण उन्हें “गोविन्द” गोपाल कहा जाता है । अतः इस जन्माष्टमी पर हमें उनके आदर्शों पर चलने का दृढ़ संकल्प करना चाहिए कि हम अपनी भारतमाता के साथ ही गोमाता की भी रक्षा करेंगे । और जैसे भगवान् श्रीकृष्ण ने देवराज का दर्प चूर्ण चूर्ण कर दिया था ।
वैसे ही हम देशद्रोहियों गोहत्यारों यवनराज ( आतंकवादी मुल्लों ) का दर्पदलन कर देंगे । तभी हमारे व्रत की सफलता है ।