Thursday, February 11, 2016

जहां हर कोई है दीवाना मेरे बांके बिहारी का
मेरे बांके बिहारी का, मेरे कुञ्ज बिहारी का
मैं भी हो गया मस्ताना मेरे बांके बिहारी का

पाग बांधे यह जरतारी बांके की अँखियाँ कजरारी
वो मीठा मीठा मुस्काना मेरे मोहनी बिहारी का
जहां हर कोई है दीवाना...

यहां बहे प्रेम की धारा वृन्दावन भक्ति का द्वारा
लूट रहा प्रेम खजाना राधा नित्त बिहारी का
जहां हर कोई है दीवाना...

कभी दर्शन वो दिखलावे कभी परदे में छिप जावे
हाय कैसा यह शर्माना राधा रसिक बिहारी का
जहां हर कोई है दीवाना...

देख पागल हुआ तुमको यह कहना है हमे सबको
यह ‘चित्र विचित्र’ की जोड़ी है नजराना रसिक बिहारी का
जहां हर कोई है दीवाना...

जय श्री राधे श्याम 🌷🙏🙏ऐसे रात गुजारी हमने, तेरी याद में..............
🌷🌹🌷🌹🌷🌹🌷🌹
रातों को करवट बदल-बदल के
घूम-घूम के टहल-टहल के,
देखी राह तुम्हारी हमने
ऐसी रात गुजारी हमने !!
सुंदर-सुंदर प्यारी-प्यारी
कानों में आवाज तुम्हारी,
कितनी बार उतारी हमने
ऐसे रात गुजारी हमने !!
दिल में अपने बना रखी है
इन आँखों में सजा रखी है,
इक तस्वीर तुम्हारी हमने
ऐसे रात गुजारी हमने !!
कुछ तारे कुछ खुशबू चुनकर
मीठे-मीठे सपने बुनकर,
कर ली सब तैयारी हमने
ऐसे रात गुजारी हमने !!
शुभ रात्रि🌹🙏🌹

महर्षि वाल्मीकि द्वारा लिखित रामायण में भगवान श्रीराम को मर्यादा पुरुषोत्तम बताया गया है। श्रीराम भगवान विष्णु के रूप थे। स्वाभाविक है कि श्रीराम का चरित्र भी भगवान के समान सौम्य होगा। लेकिन श्रीराम के छोटे भाई लक्ष्मण जोकि शेषनाग के अवतार थे, के चरित्र के बारे में कम ही लोग जानते होंगे। लक्ष्मणजी के चरित्र के बारे में रामायण में कई जगह उल्लेख मिलता है। एक बार महर्षि अगस्त्य श्रीराम की सभा में आए। राम ने लंका के युद्ध की चर्चा करते हुए उनसे कहा, 'मैंने रावण, कुंभकर्ण को रणभूमि में मार गिराया था तथा लक्ष्मण ने इंद्रजीत और अतिकाय का वध किया था।' तब महर्षि बोले, 'हे राम! इंद्रजीत लंका का सबसे बड़ा वीर था। वह इंद्र को बांध कर लंका ले आया था। ब्रह्माजी आकर इंद्र को मांग ले गए। इंद्रजीत बादलों की ओट में रहकर युद्ध करता था। लक्ष्मण ने उसका वध किया तो लक्ष्मणजी के समान त्रिभुवन में कोई वीर नहीं है।' यह सुनकर श्रीराम बोले, 'मुनिवर यह आप क्या कह रहे हैं? महावीर कुंभकर्ण और रावण को पराजित करना मुश्किल काम था। तब आप इंद्रजीत पर इतने मेहरबान क्यों हैं?' तब महर्षि अगस्त्य बोले,' इंद्रजीत को वरदान था कि जो व्यक्ति चौदह वर्ष तक नहीं सोया हो, न ही इन वर्षों में किसी स्त्री का मुख देखा हो, इन वर्षों में भोजन नहीं किया हो ऐसा व्यक्ति ही इंद्रजीत को मार सकता था।' तब श्रीराम बोले, 'मुनिवर आपका कहना ठीक है। लेकिन हम चौदह वर्ष तक साथ रहे, पर लक्ष्मण सोए नहीं ? इस बात पर कैसे विश्वास किया जाए?' तब श्रीराम ने सभा बुलाई जिसमें लक्ष्मणजी भी आमंत्रित थे। लक्ष्मण जी से जब यह बात पूछी गई कि आप चौदह वर्ष तक सोए नहीं, क्या तुम अन्न नहीं खाया ? लक्ष्मणजी ने कहा कि, 'जब रावण, माता सीता जी का हरण करके ले गया तब हम माता सीता जी को खोजते हुए ऋष्यमूक पर्वत पर पहुंचे। वहां सुग्रीव ने माता सीता के आभूषण दिखाए लेकिन में उनके नुपूर( पैरों की बिछिया) ही पहचान पाया क्योंकि मैंने उन्हें चौदह वर्षों तक देखा ही नहीं था उनसे बात करते समय मेरी निगाह सिर्फ माता के चरणों पर रहती थी।' जब आप और माता सीता कुटिया में रहते थे तो मैं बाहर पहरा देता था। जब मुझे नींद आती तो मैं अपने बाणों से आंखों को कष्ट पहुंचाता ताकि नींद न आए। इस तरह में चौदह वर्ष तक जागता रहा। मैं अन्न इसलिए नहीं खाता था, क्योंकि मैं जंगल में जाकर फल लाता था, और आप उनके तीन भाग करते थे। आपने कभी मुझसे उन्हें खाने के लिए नहीं कहा, आपकी आज्ञा के बिना मैं अन्न कैसे खा सकता था। अतः चौदह वर्ष से सभी फल मेरे पास सुरक्षित रखे हुए हैं। तब उन्होंने फल लाने का आदेश हनुमान जी को दिया। फलों के बारे में सुनकर हनुमानजी को अहंकार आ गया कि इन फलों को मैं आसानी से ला सकता हूं। जब वह फल लेने गए तो उसकी टोकरी को हिला भी नहीं पाए। उन्होंने सभा में आकर श्रीराम जी से कहा कि प्रभु में उन फलों की टोकरी को हिला भी नहीं पा रहा हूं। तब श्रीराम ने लक्ष्मण जी को फल लाने का आदेश दिया और उनसे पूरे फल गिनकर लाने को कहा। फलों की गिनती में सात दिनों के फल कम निकले। श्रीराम बोले कि, 'तो सात दिनों के फल तुमने खा लिए थे। लक्ष्मण जी बोले, नहीं प्रभु, दरअसल जिस दिन पिता की मृत्यु का समाचार सुनकर हम वियोग में रहे उन सात दिनों में हम विश्वामित्र आश्रम में निराहार रहे। जिस दिन में इंद्रजीत के नागपाश में बंधा था, उस दिन फल नहीं लाया था। जिस दिन रावण ने मुझे शक्ति मारी थी। उस दिन भी मैं फल नहीं ला सका। जिस दिन रावण की मृत्यु का अपार हर्ष था उस दिन भी मैं फल नहीं लाया था।' आपके मन में यही शंका है कि मैं फल खाता था या नहीं दरअसल आप भूल गए हैं कि ऋर्षि विश्वामित्र से हमें ऐसा मंत्र मिला था। जो मुझे याद है। उसी के चलते में बिना अन्न-जल के चौदह वर्ष उपवासी रहा। इन सभी कारणों से इंद्रजीत मेरे हाथ से मारा गया। यह सब कुछ सुनकर भगवान श्रीराम ने अपने आज्ञाकारी और अतुल्य अनुज को गले लगा लिया।

महर्षि वाल्मीकि द्वारा लिखित रामायण में भगवान श्रीराम को मर्यादा पुरुषोत्तम बताया गया है। श्रीराम भगवान विष्णु के रूप थे। स्वाभाविक है कि श्रीराम का चरित्र भी भगवान के समान सौम्य होगा। लेकिन श्रीराम के छोटे भाई लक्ष्मण जोकि शेषनाग के अवतार थे, के चरित्र के बारे में कम ही लोग जानते होंगे।
लक्ष्मणजी के चरित्र के बारे में रामायण में कई जगह उल्लेख मिलता है। एक बार महर्षि अगस्त्य श्रीराम की सभा में आए। राम ने लंका के युद्ध की चर्चा करते हुए उनसे कहा, 'मैंने रावण, कुंभकर्ण को रणभूमि में मार गिराया था तथा लक्ष्मण ने इंद्रजीत और अतिकाय का वध किया था।'
तब महर्षि बोले, 'हे राम! इंद्रजीत लंका का सबसे बड़ा वीर था। वह इंद्र को बांध कर लंका ले आया था। ब्रह्माजी आकर इंद्र को मांग ले गए। इंद्रजीत बादलों की ओट में रहकर युद्ध करता था। लक्ष्मण ने उसका वध किया तो लक्ष्मणजी के समान त्रिभुवन में कोई वीर नहीं है।'
यह सुनकर श्रीराम बोले, 'मुनिवर यह आप क्या कह रहे हैं? महावीर कुंभकर्ण और रावण को पराजित करना मुश्किल काम था। तब आप इंद्रजीत पर इतने मेहरबान क्यों हैं?'
तब महर्षि अगस्त्य बोले,' इंद्रजीत को वरदान था कि जो व्यक्ति चौदह वर्ष तक नहीं सोया हो, न ही इन वर्षों में किसी स्त्री का मुख देखा हो, इन वर्षों में भोजन नहीं किया हो ऐसा व्यक्ति ही इंद्रजीत को मार सकता था।'
तब श्रीराम बोले, 'मुनिवर आपका कहना ठीक है। लेकिन हम चौदह वर्ष तक साथ रहे, पर लक्ष्मण सोए नहीं ? इस बात पर कैसे विश्वास किया जाए?'
तब श्रीराम ने सभा बुलाई जिसमें लक्ष्मणजी भी आमंत्रित थे। लक्ष्मण जी से जब यह बात पूछी गई कि आप चौदह वर्ष तक सोए नहीं, क्या तुम अन्न नहीं खाया ?
लक्ष्मणजी ने कहा कि, 'जब रावण, माता सीता जी का हरण करके ले गया तब हम माता सीता जी को खोजते हुए ऋष्यमूक पर्वत पर पहुंचे। वहां सुग्रीव ने माता सीता के आभूषण दिखाए लेकिन में उनके नुपूर( पैरों की बिछिया) ही पहचान पाया क्योंकि मैंने उन्हें चौदह वर्षों तक देखा ही नहीं था उनसे बात करते समय मेरी निगाह सिर्फ माता के चरणों पर रहती थी।'
जब आप और माता सीता कुटिया में रहते थे तो मैं बाहर पहरा देता था। जब मुझे नींद आती तो मैं अपने बाणों से आंखों को कष्ट पहुंचाता ताकि नींद न आए। इस तरह में चौदह वर्ष तक जागता रहा। मैं अन्न इसलिए नहीं खाता था, क्योंकि मैं जंगल में जाकर फल लाता था, और आप उनके तीन भाग करते थे। आपने कभी मुझसे उन्हें खाने के लिए नहीं कहा, आपकी आज्ञा के बिना मैं अन्न कैसे खा सकता था। अतः चौदह वर्ष से सभी फल मेरे पास सुरक्षित रखे हुए हैं।
तब उन्होंने फल लाने का आदेश हनुमान जी को दिया। फलों के बारे में सुनकर हनुमानजी को अहंकार आ गया कि इन फलों को मैं आसानी से ला सकता हूं। जब वह फल लेने गए तो उसकी टोकरी को हिला भी नहीं पाए।
उन्होंने सभा में आकर श्रीराम जी से कहा कि प्रभु में उन फलों की टोकरी को हिला भी नहीं पा रहा हूं। तब श्रीराम ने लक्ष्मण जी को फल लाने का आदेश दिया और उनसे पूरे फल गिनकर लाने को कहा। फलों की गिनती में सात दिनों के फल कम निकले।
श्रीराम बोले कि, 'तो सात दिनों के फल तुमने खा लिए थे। लक्ष्मण जी बोले, नहीं प्रभु, दरअसल जिस दिन पिता की मृत्यु का समाचार सुनकर हम वियोग में रहे उन सात दिनों में हम विश्वामित्र आश्रम में निराहार रहे। जिस दिन में इंद्रजीत के नागपाश में बंधा था, उस दिन फल नहीं लाया था। जिस दिन रावण ने मुझे शक्ति मारी थी। उस दिन भी मैं फल नहीं ला सका। जिस दिन रावण की मृत्यु का अपार हर्ष था उस दिन भी मैं फल नहीं लाया था।'
आपके मन में यही शंका है कि मैं फल खाता था या नहीं दरअसल आप भूल गए हैं कि ऋर्षि विश्वामित्र से हमें ऐसा मंत्र मिला था। जो मुझे याद है। उसी के चलते में बिना अन्न-जल के चौदह वर्ष उपवासी रहा। इन सभी कारणों से इंद्रजीत मेरे हाथ से मारा गया। यह सब कुछ सुनकर भगवान श्रीराम ने अपने आज्ञाकारी और अतुल्य अनुज को गले लगा लिया।

एक बार युधिष्ठिरअपने पितामह भीष्म के पास गए और बोले “हे तात श्री! क्या आप मेरी एक दुविधा सुलझाएंगे? क्या आप मुझे सच सच बताएंगे की स्त्री या पुरुष दोनो में से वो कौन है जो सम्भोग के समय ज़्यादा आनंद को प्राप्त करता है?” भीष्म बोले, “इस सम्बंध में तुम्हें भंगस्वाना और सकरा की कथा सुनाता हूँ, जिसमे तुम्हारे सवाल का जवाब छुपा है। “

भंगस्वाना और सकरा की कथा

बहुत समय पहले भंगस्वाना नाम का एक राजा रहता था। वह न्यायप्रिय और बहुत यशस्वी था लेकिन उसके कोई पुत्र नहीं था। एक बालक की इच्छा में उस राजा ने एक अनुष्ठान किया जिसका नाम था ‘अग्नीष्टुता’. क्यूंकि उस हवन में केवल अग्नि भगवान का आदर हुआ था इसलिए देवराज इन्द्र काफी क्रोधित हो गए।

इंद्र अपने गुस्से को  निकालने के लिए एक मौका ढूँडने लगे ताकि राजा भंगस्वाना से कोई गलती हो और वह उसे दंड दे सकें। पर भंगस्वाना इतना अच्छा राजा था की इन्द्र को कोई मौका नहीं मिल रहा था जिस कारण से इन्द्र का गुस्सा और बढ़ता जा रहा था था। एक दिन राजा शिकार पर निकला, इन्द्र ने सोचा ये सही समय है और अपने अपमान का बदला लेने का और इन्द्र ने राजा को सम्मोहित कर दिया।

राजा भंगस्वाना जंगल में इधर-उधर भटकने लगा. अपनी सम्मोहित हालत में वह सब सुध खो बैठा, ना उसे दिशाएं समझ आ रही थीं और ना ही अपने सैनिक नहीं दिख रहे थे. भूख-प्यास ने उसे और व्याकुल कर दिया था। अचानक उसे एक छोटी सी नदी दिखाई थी जो किसी जादू सी सुन्दर लग रही थी. राजा उस नदी की तरफ बढ़ा और पहले उसने अपने घोड़े को पानी पिलाया, फिर खुद पिया।

जैसे ही राजा ने नदी के अंदर प्रवेश की, पानी पिया, उसने देखा की वह बदल रहा है। धीरे-धीरे वह एक स्त्री में बदल गया। शर्म से बोझल वह राजा ज़ोर ज़ोर से विलाप करने लगा. उसे समझ नहीं आरहा था की ऐसा उसके साथ क्यूं हुआ।

राजा भंगस्वाना सोचने लगा, “हे प्रभु! इस अनर्थ के बाद में कैसे अपने राज्य वापस जाउं? मेरे अग्नीष्टुता’ अनुष्ठान से मेरे 100 पुत्र हुए हैं उन्हें मैं अब कैसे मिलूंगा, क्या कहूंगा? मेरी रानी, महारानी जो मेरी प्रतीक्षा कर रहीं हैं, उनसे कैसे मिलूंगा? मेरे पोरुष के साथ-साथ मेरा राज-पाट सब चला जाएगा, मेरी प्रजा का क्या होगा” इस तरह से विलाप करता राजा अपने राज्य वापस लौटा।

स्त्री के रूप में जब राजा वापस पँहुचा तो उसे देख कर सभी लोग अचंभित रह गए। राजा ने सभा बुलाई और अपनी रानियों, पुत्रों और मंत्रियों से कहा की अब मैं राज-पाट संभालने के लायक नहीं रहा हूँ, तुम सभी लोग सुख से यहाँ रहो और मैं जंगल में जाकर अपना बाकी का जीवन बीताउंगा.

ऐसा कह कर वह राजा जंगल की तरफ प्रस्थान कर गया। वहां जाकर वह स्त्री रूप में एक तपस्वी के आश्रम में रहने लगी जिनसे उसने कई पुत्रों को जन्म दिया। अपने उन पुत्रों को वह अपने पुराने राज्य ले गयी और अपने पुराने बच्चो से बोली, “तुम मेरे पुत्र हो जब में एक पुरुष था, ये मेरे पुत्र हैं जब में एक स्त्री हूँ। मेरे राज्य को मिल कर, भाइयों की तरह संभालो।” सभी भाई मिलकर रहने लगे।

सब को सुख से जीवन व्यतीति करता देख, देवराज इन्द्र और ज़्यादा क्रोधित हो जाए और उनमें बदले की भावना फिर जागने लगी। इन्द्र सोचने लगा की ऐसा लगता है की राजा को स्त्री में बदल कर मैने उसके साथ बुरे की जगह अच्छा कर दिया है। ऐसा कह कर इन्द्र ने एक ब्राह्मण का रूप धारा और पहुँच गया राजा भंगस्वाना के राज्य में। वहां जाकर उसने सभी राजकुमारों के कान भरने शुरू कर दिए।

इंद्र के भड़काने की  वजह से सभी भाई आपस में लड़ पड़े और एक दूसरे को मार डाला। जैसे ही भंगस्वाना को इस बात का पता चला वह शोकाकुल हो गया। ब्राह्मण के रूप में इन्द्र राजा के पास पहुंचा और पूछा की वह क्यूँ रो रही है। भंगस्वाना ने रोते रोते पूरी घटना इन्द्र को बताई तो इन्द्र ने अपना असली रूप दिखा कर राजा को उसकी गलती के बारे में बताया।

मृत्यु का रहस्य

याज्ञवल्क्य ने जाने कितने छात्रों को, जाने कितनी बार पढ़ाया होगा यह सूक्त। कितनी बार दुहराया होगा वह अर्थ जो उन्होंने अपने गुरु से सुना था। पर आज पहला मन्त्र पढ़ना आरम्भ किया, ‘‘न असत् आसीत् न सत् आसीत् तदानीं’’ कि हठात् रुक गये। शिष्यगण विस्मय से उन्हें देख रहे थे। उनके होठ खुले थे पर न तो उनमें कम्पन था न गति। शायद उन्हें यह बोध भी नहीं रह गया था कि उनके सामने उनके शिष्य भी बैठे हुए हैं। वह इस ऋचा पर नहीं रुके थे। पूरा सूक्त एक काली लौ की तरह उनकी चेतना में एक साथ काँप-सा रहा था। काली लौ। किसी को समझाना चाहें तो कितना कठिन होगा। समझेगा धुएँ या कुहासे की बात कर रहे हैं। पर धुएँ और कुहासे को देखने के लिए भी प्रकाश तो चाहिए। यह तो सघन काले अँधेरे के बीच एक काली शिखा के काँपने की अनुभूति थी जो दृष्टिगम्य नहीं थी पर फिर भी अनुभूतिगम्य थी। अनुभूतिगम्य भी नहीं, बोधगम्य। सत् नहीं, असत् नहीं, वायु नहीं, आकाश नहीं, कोई दिशा नहीं, कोई गति नहीं, कोई आधार नहीं, मृत्यु नहीं, अमरता नहीं, न रात, न दिन, न प्रकाश, न अन्धकार।
‘‘नहीं, अन्धकार तो था। उबलता हुआ अन्धकार! तरल! अपने में ही छिपा हुआ! अन्धकार तो था।’’ उनके मुँह से निकला पर इस समय भी न तो उन्हें यह बोध था कि उनके शिष्य उनको विस्मय से देख रहे हैं न ही यह कि वह उन्हें पाठ पढ़ाने बैठे थे। वह अपने से आत्मालाप कर रहे थे। आत्मालाप भी नहीं। बोलते हुए सोच रहे थे।
        परन्तु इस अन्धकार से पहले। तब, जब अन्धकार भी नहीं रहा होगा। जब कुछ न रहा होगा, तब क्या था? कुछ नहीं के होने को क्या कहेंगे वह? उसे अन्धकार कहना ठीक नहीं लग रहा था और उन्हें उस अवस्था के लिए कोई शब्द मिल नहीं रहा था। सूक्तकार को भी शब्द न मिला होगा। तभी तो अन्धकार कह दिया। भाषा तो उसके रचे हुए संसार को व्यक्त करने का साधन है। उस अरचित, अरूप, अनाकार को कैसे व्यक्त कर पाएगी। और फिर प्रश्न केवल भाषा का था भी नहीं। विकास की उस प्रक्रिया का था जिसका न तो कोई द्रष्टा था, न ज्ञाता। जो केवल अनुमान और ध्यान का विषय था। एक लम्बा समय गुजर गया अपने आप से जूझते। शास्त्रों और श्रुतियों में जो पढ़ा था उसे जोड़ते-मिलाते।
पर तभी, उनकी कल्पना के सामने उपस्थित उस अन्धकार से ही जैसे एक शब्द फूटा, कुछ यूँ कि जैसे अन्धकार ही सिमटकर शब्द बन गया हो, ‘मृत्यु’ उन्हें लगा उन्होंने इस शब्द को सोचा नहीं है, सुना है। एक अस्फुट विस्फोट के रूप में।
‘‘जब कुछ नहीं था तब मृत्यु थी।’’ जैसे कोई समझा रहा हो उन्हें, परम गुरु की भाँति, मृत्यु का कोई रूप या आकार तो है नहीं। अस्तित्व का अभाव ही तो मृत्यु है। रूप का, आकार का, क्रिया का, गति का, किसी का भी न रह जाना। यदि किसी का अस्तित्व था ही नहीं तो वह अन्धकार भी नहीं रहा होगा। मृत्यु ही रही होगी। अन्धकार का भी रूप उसी ने लिया होगा। यदि कोई अपने जन्म से पूर्व की अवस्था को नहीं समझ पाता तो परमेष्ठी कैसे समझ पाते। वह भी अपने पूर्व रूप को समझ न पाये। उस अन्धकार से पहले वह स्वयं मृत्यु रूप ही थे। जीवन और सृजन क्या जो नहीं था उसका हो जाना, जिसका अस्तित्व नहीं था उसका अस्तित्व में आ जाना ही नहीं है। ‘‘सब कुछ मृत्यु से निकला है। मृत्यु ही जीवन का गर्भ है। सृष्टि का मूल।’’ उनके मुँह से निकला। अब वह कुछ आत्मसजग हो गये थे। शिष्यों पर दृष्टि गयी तो हँसी आ गयी, ‘‘सब कुछ उसी से निकला है। मृत्यु से ही। वही थी। मृत्युना एव इदं आवृतं आसीत्। मृत्यु से ही सब कुछ ढका हुआ था। क्षुधा से ही आवृत था सब कुछ। अशनाया से। अशनाया हि मृत्युः। मृत्यु क्षुधा का ही दूसरा नाम तो है। सब कुछ को निगलती चली जाती है यह। परम क्षुधा। अमिट और अनन्त भूख। इसी का कभी अन्त नहीं होता। सृष्टि से पहले भी यही थी और सृष्टि के बाद भी यही क्रियाशील रहती है। कभी अपने गर्भ में छिपी और कभी अपने को ही उद्घाटित करती। अपने से बाहर आकर अपने को ही ग्रसती।’’
‘‘अनन्त भूख। यही तो मृत्यु की लालसा है। और इसी से सब कुछ पैदा हुआ। मृत्यु की इस लालसा से ही।’’
        शिष्य विस्मय में आचार्य को देख रहे थे। याज्ञवल्क्य की आदत है पढ़ाते-पढ़ाते कहीं खो जाने की। पर इस तरह का आत्मालाप और फिर मुखर संवाद वह पहली बार कर रहे थे। शिष्य विस्मय में उन्हें देख रहे थे और जो कुछ उनके शब्दों और भावों से प्रकट हो रहा था उसे ग्रहण करने का प्रयत्न कर रहे थे।अब वह सचमुच उन्हें समझा रहे थे, ‘‘इस मृत्यु से यह जीवन कैसे निकल आया? हुआ यह कि उस परम मृत्यु के जी में आया कि वह आत्मा से युक्त हो जाए।’’ वह फिर रुक गये। रुककर कुछ सोचने लगे। फिर बोले, ‘‘इसके लिए उसने लम्बे अरसे तक अर्चन किया। अब इससे क या जल उत्पन्न हुआ। यह जल सामान्य जल नहीं था। इसमें द्रव भी था और स्थूल भी, वायु भी और तेज भी। आकाश भी उसी में विद्यमान था और दिशाएँ भी उसी में मिली हुई थीं। यह कारण जल पंचविपाक था। सभी घुलकर द्रव में बदल गये थे। यही वह तरल अन्धकार था। अपने आप में सिमटा हुआ। निगूढ़। घनीभूत। अपने उत्ताप में तपता हुआ, पर अपने ही दबाव में इतना कसा हुआ कि उफनने को भी अवकाश नहीं। ‘‘और फिर इसके अपने ही ताप से इसी का शर या स्थूल भाग एकत्र हो गया। जम गया। यही जमकर पृथ्वी बन गया। यह पृथिवी शर भाग से बनी अतः यही प्रजापति का प्रथम शरीर हुआ। उसका व्यक्त रूप।’’ ‘‘फिर?’’ प्रश्न किसी अन्य ने नहीं किया था। उन्होंने अपने आप से किया था। ‘‘क्या हुआ होगा उसके बाद?’’ वह जो तप रहा था उसके स्थूल अंश के अलग हो जाने पर उसके उस ताप का क्या हुआ? उससे अग्नि-रस या द्रवित ऊष्मा अलग हुई वही अग्नि बन गयी। यही प्रजापति ही पहला शरीरी हुआ। पर इसमें बहुत लम्बा समय लगा। बहुत लम्बा। ‘‘फिर इसके बाद?’’ अब याज्ञवल्क्य का चिन्तक कवि में बदल गया। उनके सामने एक विराट रूपक खड़ा हो गया। उस प्रजापति ने अपने को तीन भागों में विभक्त कर दिया। इसका एक तिहाई वायु हो गया। एक तिहाई आदित्य। यह पूर्व दिशा ही उस प्रजापति का सिर है। ईशानी और आग्नेयी दिशाएँ उसकी भुजाएँ हैं। पश्चिम दिशा उसका पुच्छ भाग है और वायव्य व नैऋत्य दिशाएँ उसकी जंघाएँ। दक्षिण और उत्तर दिशाएँ उसके पार्श्व हैं। द्युलोक पृष्ठभाग, अन्तरिक्ष उदर और यह पृथिवी उसका हृदय है। यह अग्नि रूप प्रजापति पहले द्रव रूप में ही था और इसलिए जल में ही उसका निवास था।
        परन्तु सृष्टि चक्र यहीं समाप्त तो नहीं हो जाता। बहुत कुछ है इस संसार में। कैसे हो गया वह। याज्ञवल्क्य आत्मसम्मोहन की अवस्था में पहुँच गये थे। उसने फिर कामना की कि उसका एक और रूप उत्पन्न हो। उसने वाणी की मिथुन रूप में भावना की और इससे संवत्सर की उत्पत्ति हुई। इससे पहले संवत्सर नहीं था। संवत्सर की जो अवधि है उतने समय तक मृत्यु रूपी प्रजापति ने उसे गर्भ में धारण किये रखा। फिर उसे उत्पन्न किया। उत्पन्न करने के बाद उसने उसका मुँह फाड़ा। उसका मुँह फटते ही उससे भाण् की आवाज निकली। इसी से वाक् की उत्पत्ति हुई। अब उसने उस वाणी और मन के संयोग से ऋक्, साम, यजुर्वेद को, छन्दों को, और ये जो प्रजा और पशु हैं उनको रचा। परन्तु प्रजापति स्वयं ही मृत्यु रूप है अतः उसने जिनको भी रचा उन सभी को खाने का विचार किया। इसीलिए मृत्यु को ही अदिति भी कहते हैं।  इस मृत्यु ने, सत् और असत् दोनों के इस अभाव ने, कुछ होने का संकल्प किया। जो है ही नहीं वह सोच सकता है क्या? यहाँ आकर इन कवियों के भी प्रेरक नासदीय सूक्त के कवि ने एक मुसीबत खड़ी कर दी। पर आरम्भ तो कहीं से होना था। एक चरम बिन्दु पर पहुँचकर हमारे तर्क व्यर्थ तो हो ही जाते हैं। हमारी मोटी बुद्धि हमारा साथ नहीं दे पाती। आइंस्टाइन कहते हैं-समय और आकाश दोनों का अन्त है पर वह इतना विराट है कि इसकी हम कल्पना तक नहीं कर सकते। अन्त है पर नहीं है। ठीक यही भाषा है और नहीं है। और यह भाषा या-तो-यह-या-वह वाली अनिश्चयात्मक भाषा भी नहीं है। सीधा निषेध है। यह भी नहीं और वह भी नहीं। नहीं भी नहीं और नहीं का नहीं भी। न इति, न इति। और इसीलिए ज्ञान का दावा अज्ञान का सूचक और अज्ञान की स्वीकृति ज्ञान का प्रमाण, क्योंकि यहाँ ज्ञान का अर्थ ही अज्ञेयता का बोध है। अतः यह कहना कि मृत्यु के मन में, उस विराट क्षुधा या अशनाया के मन में कुछ बनने का विचार नहीं आ सकता, उतना ही जोखिम भरा है जैसे यह बताना कि यह विचार कैसे और क्यों आया होगा।
हमारी समझ के लिए इतना ही काफी है कि यह विचार आया।
सृष्टि से पहले कुछ नहीं था। अस्तित्व से पहले अस्तित्व का अभाव था। अस्तित्व के अभाव का ही दूसरा नाम है मृत्यु। जब कुछ नहीं था तो मृत्यु ही थी। उस महातिमिर की भाँति जिसे विज्ञानी ब्लैक होल या अन्ध विवर कहते हैं। जो अपने प्रबल गुरुत्व के कारण प्रकाश रश्मियों तक को बाहर निकलने नहीं देता। जो अपने सघन दबाव के कारण परम द्रव को खौलने तक नहीं देता। वह जिसका विस्फोट हो तो वह अपने अदृश्य आकार के हजारों-लाखों गुने दृश्य पिण्डों में बदल जाए। याज्ञवल्क्य और उनके युग के लिए ही नहीं, हमारे आज के साधन सम्पन्न और परमज्ञता का दावा करनेवाले युग के लिए भी वह न इति न इति ही बना रह गया है। सृष्टि का आरम्भ कैसे हुआ? खोज आज भी जारी है जबकि वह आरम्भ समाप्त नहीं हुआ है और वह महासत्ता परम व्योम में आज भी अपना विस्तार करती जा रही है। पिण्ड अज्ञात वेग से फैलते चले जा रहे हैं और साथ ही उस महाकार मुख में समृद्ध वेग हो विनाश के लिए दौड़ते जा रहे हैं। नित्य कितने ब्रह्माण्ड गतायु होकर नष्ट हो रहे हैं, पिण्ड से महाचूर्ण में बदलकर महाव्योम में गुलाल की तरह बिखर जा रहे हैं, इसका कोई हिसाब है। सृष्टि के आदि बिन्दु को लेकर सिद्धान्त बनते हैं पर याज्ञवल्क्य की भाषा में कहें तो उनको आयतन और प्रतिष्ठा नहीं मिल पाती। कुछ समय तक टिके रहते हैं और फिर न इति में बदल जाते हैं। यह भी नहीं। इस व्याख्या का कोई अर्थ है? नहीं, यह भी नहीं। यह तो कहनी भी नहीं है। याज्ञवल्क्य को लगा कुछ प्रश्नों का उत्तर केवल मौन से ही दिया जा सकता है।

हृदय की पीड़ा को, प्रेम रस वीणा को,

प्रकट हो जाने दो, आज मुझे गाने दो!

नयनों के बादर से, भावों के सागर से,

बरस अब जाने दो, आज मुझे गाने दो!

प्रीतम के प्रीत को, मेरे हर गीत को,

एक हो जाने दो, आज मुझे गाने दो!

जग के कुरीत को, बंधन की रीत को,

टूट अब जाने दो, आज मुझे गाने दो!

सुरभित पवन को, पल्लिवत चमन को,

गीत गुनगुनाने दो ,आज मुझे गाने दो!

चाँद और चकोर को, वर्षा और मोर को,

मिल अब जाने दो, आज मुझे गाने दो!

झील के किनारों से , मस्त नजारों से,

स्वर को लहराने दो, आज मुझे गाने दो!

बसंत सुगंत को, पुष्प और मकरंद को,

बिखर अब जाने दो, आज मुझे गाने दो!

मर्यादा का मतलब किसी एक की अपनी जिंदगी से नही बल्कि अपने उस पूरे समाज से है जिसमे हम रह रहे हैं और वो उस पर निर्भर करता है . और समय समय पर समाज में परिवेर्तन होते आये है जैसे की राजा दसरथ के समय में समाज में बहुविवाह प्रचलित था जबकि राम ने सिर्फ १ विवाह करके उस समय के समाज में परिवर्तन लाया और लोग इससे बहुत प्रभावित हुए और एक विवाह की ओर प्रेरित हुए शायद यहाँ से ही वे मर्यादित कहलाने लगे थे चूँकि उन्होंने उस समय के समाज को प्रभावित किया था .मर्यादा  के अनेक उदाहरण हैं लेकिन हमे यह सर्वोच्च समझ मे आया, समाज को एक अच्छा मार्गदर्शन कराना समाज की बूराइयों को दूर करना ही मर्यादा का मूल रूप है