Thursday, February 11, 2016

हृदय की पीड़ा को, प्रेम रस वीणा को,

प्रकट हो जाने दो, आज मुझे गाने दो!

नयनों के बादर से, भावों के सागर से,

बरस अब जाने दो, आज मुझे गाने दो!

प्रीतम के प्रीत को, मेरे हर गीत को,

एक हो जाने दो, आज मुझे गाने दो!

जग के कुरीत को, बंधन की रीत को,

टूट अब जाने दो, आज मुझे गाने दो!

सुरभित पवन को, पल्लिवत चमन को,

गीत गुनगुनाने दो ,आज मुझे गाने दो!

चाँद और चकोर को, वर्षा और मोर को,

मिल अब जाने दो, आज मुझे गाने दो!

झील के किनारों से , मस्त नजारों से,

स्वर को लहराने दो, आज मुझे गाने दो!

बसंत सुगंत को, पुष्प और मकरंद को,

बिखर अब जाने दो, आज मुझे गाने दो!

मर्यादा का मतलब किसी एक की अपनी जिंदगी से नही बल्कि अपने उस पूरे समाज से है जिसमे हम रह रहे हैं और वो उस पर निर्भर करता है . और समय समय पर समाज में परिवेर्तन होते आये है जैसे की राजा दसरथ के समय में समाज में बहुविवाह प्रचलित था जबकि राम ने सिर्फ १ विवाह करके उस समय के समाज में परिवर्तन लाया और लोग इससे बहुत प्रभावित हुए और एक विवाह की ओर प्रेरित हुए शायद यहाँ से ही वे मर्यादित कहलाने लगे थे चूँकि उन्होंने उस समय के समाज को प्रभावित किया था .मर्यादा  के अनेक उदाहरण हैं लेकिन हमे यह सर्वोच्च समझ मे आया, समाज को एक अच्छा मार्गदर्शन कराना समाज की बूराइयों को दूर करना ही मर्यादा का मूल रूप है

।।सम्मान पाने के लिए मर्यादा का पालन जरूरी है।।

संसार में भगवान राम मर्यादा पुरूषोत्तम के रूप में पूजे जाते हैं। इसका कारण यह है कि इन्होंने अपने जीवन में हर रिश्ते के साथ न्याय किया। इन्होंने कभी भी बड़ा होने का अभिमान नहीं दिखाया।
इन्होंने छोटे भाइयों को सम्मान दिया और सदैव माता-पिता के आज्ञाकारी रहे। पत्नी की सुरक्षा के लिए रावण से लड़े और राजा के रूप में जनता को महत्व दिया।
लेकिन जब कोई व्यक्ति अपनी मर्यादा की सीमा रेखा को तोड़कर आगे बढ़ने की कोशिश करता है तभी विवाद और क्लेश उत्पन्न होता है।
वर्तमान समय में कई ऐसी घटनाएं सामने आ रही हैं कि बेटे ने पिता को घर से बाहर निकाल दिया। बेटे ने बाप की संपत्ति हड़प ली। ससुर का अपनी बहू से अनैतिक संबंध है और भाई ने बहन का अपमान किया।
जब ऐसी घटनाएं होती हैं तो मर्यादा का हनन होता है। संसार में रिश्तों की डोर का निर्माण मर्यादा की रक्षा के लिए किया गया था। यही सामाजिक जीवन का आधार भी है।
जब कोई मार्यादा का उल्लंघन करता है तब सामाजिक व्यवस्था बिगडने लगती है और मर्यादा का उल्लंघन करने वाला और मर्यादा का हनन होने वाला दोनों ही अपमानित होता है। जब कोई किसी के साथ अमर्यादित व्यवहार करता है तो उसे भी अर्मायादित व्यवहार ही प्राप्त होता है।
उदाहरण के तौर पर गंगा नदी जब तक अपनी सीमा में प्रवाहित होती है उसे माता का दर्जा प्राप्त होता है, लोग इसकी आरती उतारते हैं। लेकिन जब अपनी मर्यादा का उल्लंघन करके तटों को तोड़कर आगे बढ़ती है तब गंगा आदरणीय नहीं रह जाती है। नाले के जल में मिलकर गंगाजल 'गंदाजल' कहलाने लगता है।

पाकिस्तान के एक गाँव में रामफल रहता था , उसका परिवार ही बस हिन्दू था पुरे गाँव में .. . एक दिन उसका बाबु गुजर गया तो वो गाँव के सर पंच के पास गया और बोला सरपंच जी मेरे बाबु का देहांत हो गया है मुझे उनका अंतिम संस्कार करना है, वो सरपंच बोला देख रामफल ये मुसलमानों का गाँव है यहाँ तो बस तुम दफना सकते हो ,बेचारा रामफल उस टाइम तो मान गया और अपने बाबु को दफना दिया ! . पर उसको चैन नही आया और सोचने लगा की जब तक बाबु की चिता को आग नही मिलेगी तब तक उनकी आत्मा को शांति नही मिलेगी ,इसलिए कुछ तो करना पड़ेगा, . जब थोड़ी सी रात हुई तो वो कब्रिस्तान गया और अपने बाबु को कब्र से निकाल कर साथ वाली कब्र में लेटा आया और सुबह सरपंच के पास गया और बोला सरपंच जी बहुत बड़ी गड़बड़ होगी कार की चाबी मेरे बाबु की जेब में ही रह गयी है इसलिए एक बार कब्र खोदने पड़ेगी सरपंच उसकी बात मान कर कुछ आदमियों को कब्र खोदने के लिए ले गया जब कब्र खोदी तो रामफल का बाबु उसमे नही मिला ये देख कर सब हेरान हो गये और सोचने लगे की लाश कहा गयी, . तभी रामफल बोला, सरपंच जी मेरे बाबु तो सुबह घुमने की आदत थी और वो घूमते घूमते दूर दूर तक चले जाते थे इसलिए हो सकता है की किसी दूसरी कब्र में चले गये होंगे, सरपंच बोला ऐसा नही होता, रामफल बोला, . आप मेरे बाबु को नही जानते, वो कही भी जा सकते हैं सरपंच ने उसकी बात मान कर 2-3 कब्र और खुदवा दी,और फिर रामफल का बाबु एक औरत की कब्र में मिला वो कब्र सरपंच की पत्नी की थी और उसके बाबु को अपनी पत्नी के साथ लेटा देख कर सरपंच को आग सी लाग गी और बोला जल्दी से इसको अग्नि दे दो वरना ये कल किसी और की लुगाई के साथ मिलेगा ......!!!!!! . MORAL :- सुन लै बेटा पाकिस्तान बाप है तेरा हिंदुस्तान ।

उत्तरकाण्ड
         श्रीराम के राज्याभिषेक के पश्चात् स्तुति
जय राम रमारमनम शमनम् । भव ताप भयाकुल पाहि जनम् ॥
अवधेश सुरेश रमेश विभो । शरणागत माँगत पाहि प्रभो ॥
दसशीश विन्नशन बीस भुजा । कृत दूरि महाअ महि भूरि रुजा ॥
रजनीचर बृंद पत।ग रहे । सर पावक तेज प्रचंड दहे॥
महि मंदल मंदन चारुतरम् । धृत सायक चाप निषंग बरम् ॥
मद मोह महा ममता रजनी । तम पुंज दिवाकर तेज अनी ॥
मनजात किरात निपात किये । मृग लोग कुभोग सरेन हिये ॥
हति नाथ अनाथनि पाहि हरे । विषया बन पाँवर भूलि परे ॥
बहु रोग बियोगिन्हि लोग हये । भवदंघ्रि निरादर के फल ए ॥
भव सिंधु अगाध परे नर ते । पद पंकज प्रेम न जे करते ॥
अति दीन मलीन दुखी नितहीं । जिन्ह कें पद पंकज प्रीत नहीं ॥
अवलंब भवंत कथा जिन्ह कें । प्रिय संत अनंत सदा तिन्ह कें ॥
नहिं राग न लोभ न मान मदा । तिन्ह कें सम बैभव वा बिपदा ॥
एहि ते तव सेवक होत मुदा । मुनि त्यागत जोग भरोस सदा ॥
करि प्रेम निरंतर नेम लियें । पद पंकज सेवत शुद्ध हियें ॥
सम मानि निरादर आदरही । सब संत सुखी बिचरंति मही ॥
मुनि मानस पंकज भृंग भजे । रघुवीर महा रनधीर अजे ॥
तव नाम जपामि नमामि हरी । भव रोग महागद मान अरी ॥
गुन सील कृपा परमायतनम् । प्रनमामि निरंतर श्रीरमनम् ॥
रघुनंद निकंदय द्वंद्व घनम् । महिपाल बिलोकय दीन जनम् ॥
        बार बार बर मागउं हरषि देहु श्रीरंग ।
        पद सरोज अनपायनी भगति सदा सतसंग ॥

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ऋणशेषं चाग्निशेषं व्याधिशेषं तथैव च ।
पुन: पुन: प्रवर्धते तस्मान्छेषं न कारयेत ।।
शेष बचा हुअा ऋण, शेष अग्नि तथा शेष रोग पुन: पुन: बढते हैं । इन्हें शेष नहीं छोड़ना चाहिए । शौनकीयनीतिसार
सुप्रभातम् । आपका  दिन शुभदिन हो । संकलित💐👏🏻

याज्ञवल्क्य ने जाने कितने छात्रों को, जाने कितनी बार पढ़ाया होगा यह सूक्त। कितनी बार दुहराया होगा वह अर्थ जो उन्होंने अपने गुरु से सुना था। पर आज पहला मन्त्र पढ़ना आरम्भ किया, ‘‘न असत् आसीत् न सत् आसीत् तदानीं’’ कि हठात् रुक गये। शिष्यगण विस्मय से उन्हें देख रहे थे। उनके होठ खुले थे पर न तो उनमें कम्पन था न गति। शायद उन्हें यह बोध भी नहीं रह गया था कि उनके सामने उनके शिष्य भी बैठे हुए हैं। वह इस ऋचा पर नहीं रुके थे। पूरा सूक्त एक काली लौ की तरह उनकी चेतना में एक साथ काँप-सा रहा था। काली लौ। किसी को समझाना चाहें तो कितना कठिन होगा। समझेगा धुएँ या कुहासे की बात कर रहे हैं। पर धुएँ और कुहासे को देखने के लिए भी प्रकाश तो चाहिए। यह तो सघन काले अँधेरे के बीच एक काली शिखा के काँपने की अनुभूति थी जो दृष्टिगम्य नहीं थी पर फिर भी अनुभूतिगम्य थी। अनुभूतिगम्य भी नहीं, बोधगम्य।
सत् नहीं, असत् नहीं, वायु नहीं, आकाश नहीं, कोई दिशा नहीं, कोई गति नहीं, कोई आधार नहीं, मृत्यु नहीं, अमरता नहीं, न रात, न दिन, न प्रकाश, न अन्धकार।
‘‘नहीं, अन्धकार तो था। उबलता हुआ अन्धकार! तरल! अपने में ही छिपा हुआ! अन्धकार तो था।’’ उनके मुँह से निकला पर इस समय भी न तो उन्हें यह बोध था कि उनके शिष्य उनको विस्मय से देख रहे हैं न ही यह कि वह उन्हें पाठ पढ़ाने बैठे थे। वह अपने से आत्मालाप कर रहे थे। आत्मालाप भी नहीं। बोलते हुए सोच रहे थे।
परन्तु इस अन्धकार से पहले। तब, जब अन्धकार भी नहीं रहा होगा। जब कुछ न रहा होगा, तब क्या था? कुछ नहीं के होने को क्या कहेंगे वह? उसे अन्धकार कहना ठीक नहीं लग रहा था और उन्हें उस अवस्था के लिए कोई शब्द मिल नहीं रहा था। सूक्तकार को भी शब्द न मिला होगा। तभी तो अन्धकार कह दिया। भाषा तो उसके रचे हुए संसार को व्यक्त करने का साधन है। उस अरचित, अरूप, अनाकार को कैसे व्यक्त कर पाएगी। और फिर प्रश्न केवल भाषा का था भी नहीं। विकास की उस प्रक्रिया का था जिसका न तो कोई द्रष्टा था, न ज्ञाता। जो केवल अनुमान और ध्यान का विषय था। एक लम्बा समय गुजर गया अपने आप से जूझते। शास्त्रों और श्रुतियों में जो पढ़ा था उसे जोड़ते-मिलाते।
पर तभी, उनकी कल्पना के सामने उपस्थित उस अन्धकार से ही जैसे एक शब्द फूटा, कुछ यूँ कि जैसे अन्धकार ही सिमटकर शब्द बन गया हो, ‘मृत्यु’ उन्हें लगा उन्होंने इस शब्द को सोचा नहीं है, सुना है। एक अस्फुट विस्फोट के रूप में।
‘‘जब कुछ नहीं था तब मृत्यु थी।’’ जैसे कोई समझा रहा हो उन्हें, परम गुरु की भाँति, मृत्यु का कोई रूप या आकार तो है नहीं। अस्तित्व का अभाव ही तो मृत्यु है। रूप का, आकार का, क्रिया का, गति का, किसी का भी न रह जाना। यदि किसी का अस्तित्व था ही नहीं तो वह अन्धकार भी नहीं रहा होगा। मृत्यु ही रही होगी। अन्धकार का भी रूप उसी ने लिया होगा। यदि कोई अपने जन्म से पूर्व की अवस्था को नहीं समझ पाता तो परमेष्ठी कैसे समझ पाते। वह भी अपने पूर्व रूप को समझ न पाये। उस अन्धकार से पहले वह स्वयं मृत्यु रूप ही थे। जीवन और सृजन क्या जो नहीं था उसका हो जाना, जिसका अस्तित्व नहीं था उसका अस्तित्व में आ जाना ही नहीं है।
‘‘सब कुछ मृत्यु से निकला है। मृत्यु ही जीवन का गर्भ है। सृष्टि का मूल।’’ उनके मुँह से निकला। अब वह कुछ आत्मसजग हो गये थे।
शिष्यों पर दृष्टि गयी तो हँसी आ गयी, ‘‘सब कुछ उसी से निकला है। मृत्यु से ही। वही थी। मृत्युना एव इदं आवृतं आसीत्। मृत्यु से ही सब कुछ ढका हुआ था। क्षुधा से ही आवृत था सब कुछ। अशनाया से। अशनाया हि मृत्युः। मृत्यु क्षुधा का ही दूसरा नाम तो है। सब कुछ को निगलती चली जाती है यह। परम क्षुधा। अमिट और अनन्त भूख। इसी का कभी अन्त नहीं होता। सृष्टि से पहले भी यही थी और सृष्टि के बाद भी यही क्रियाशील रहती है। कभी अपने गर्भ में छिपी और कभी अपने को ही उद्घाटित करती। अपने से बाहर आकर अपने को ही ग्रसती।’’
‘‘अनन्त भूख। यही तो मृत्यु की लालसा है। और इसी से सब कुछ पैदा हुआ। मृत्यु की इस लालसा से ही।’’
शिष्य विस्मय में आचार्य को देख रहे थे। याज्ञवल्क्य की आदत है पढ़ाते-पढ़ाते कहीं खो जाने की। पर इस तरह का आत्मालाप और फिर मुखर संवाद वह पहली बार कर रहे थे। शिष्य विस्मय में उन्हें देख रहे थे और जो कुछ उनके शब्दों और भावों से प्रकट हो रहा था उसे ग्रहण करने का प्रयत्न कर रहे थे।
अब वह सचमुच उन्हें समझा रहे थे, ‘‘इस मृत्यु से यह जीवन कैसे निकल आया? हुआ यह कि उस परम मृत्यु के जी में आया कि वह आत्मा से युक्त हो जाए।’’ वह फिर रुक गये। रुककर कुछ सोचने लगे। फिर बोले, ‘‘इसके लिए उसने लम्बे अरसे तक अर्चन किया। अब इससे क या जल उत्पन्न हुआ। यह जल सामान्य जल नहीं था। इसमें द्रव भी था और स्थूल भी, वायु भी और तेज भी। आकाश भी उसी में विद्यमान था और दिशाएँ भी उसी में मिली हुई थीं। यह कारण जल पंचविपाक था। सभी घुलकर द्रव में बदल गये थे। यही वह तरल अन्धकार था। अपने आप में सिमटा हुआ। निगूढ़। घनीभूत। अपने उत्ताप में तपता हुआ, पर अपने ही दबाव में इतना कसा हुआ कि उफनने को भी अवकाश नहीं।
‘‘और फिर इसके अपने ही ताप से इसी का शर या स्थूल भाग एकत्र हो गया। जम गया। यही जमकर पृथ्वी बन गया। यह पृथिवी शर भाग से बनी अतः यही प्रजापति का प्रथम शरीर हुआ। उसका व्यक्त रूप।’’
‘‘फिर?’’ प्रश्न किसी अन्य ने नहीं किया था। उन्होंने अपने आप से किया था। ‘‘क्या हुआ होगा उसके बाद?’’
वह जो तप रहा था उसके स्थूल अंश के अलग हो जाने पर उसके उस ताप का क्या हुआ? उससे अग्नि-रस या द्रवित ऊष्मा अलग हुई वही अग्नि बन गयी। यही प्रजापति ही पहला शरीरी हुआ। पर इसमें बहुत लम्बा समय लगा। बहुत लम्बा।
‘‘फिर इसके बाद?’’
अब याज्ञवल्क्य का चिन्तक कवि में बदल गया। उनके सामने एक विराट रूपक खड़ा हो गया। उस प्रजापति ने अपने को तीन भागों में विभक्त कर दिया। इसका एक तिहाई वायु हो गया। एक तिहाई आदित्य। यह पूर्व दिशा ही उस प्रजापति का सिर है। ईशानी और आग्नेयी दिशाएँ उसकी भुजाएँ हैं। पश्चिम दिशा उसका पुच्छ भाग है और वायव्य व नैऋत्य दिशाएँ उसकी जंघाएँ। दक्षिण और उत्तर दिशाएँ उसके पार्श्व हैं। द्युलोक पृष्ठभाग, अन्तरिक्ष उदर और यह पृथिवी उसका हृदय है। यह अग्नि रूप प्रजापति पहले द्रव रूप में ही था और इसलिए जल में ही उसका निवास था।
परन्तु सृष्टि चक्र यहीं समाप्त तो नहीं हो जाता। बहुत कुछ है इस संसार में। कैसे हो गया वह।
याज्ञवल्क्य आत्मसम्मोहन की अवस्था में पहुँच गये थे।
उसने फिर कामना की कि उसका एक और रूप उत्पन्न हो। उसने वाणी की मिथुन रूप में भावना की और इससे संवत्सर की उत्पत्ति हुई। इससे पहले संवत्सर नहीं था। संवत्सर की जो अवधि है उतने समय तक मृत्यु रूपी प्रजापति ने उसे गर्भ में धारण किये रखा। फिर उसे उत्पन्न किया। उत्पन्न करने के बाद उसने उसका मुँह फाड़ा। उसका मुँह फटते ही उससे भाण् की आवाज निकली। इसी से वाक् की उत्पत्ति हुई। अब उसने उस वाणी और मन के संयोग से ऋक्, साम, यजुर्वेद को, छन्दों को, और ये जो प्रजा और पशु हैं उनको रचा। परन्तु प्रजापति स्वयं ही मृत्यु रूप है अतः उसने जिनको भी रचा उन सभी को खाने का विचार किया। इसीलिए मृत्यु को ही अदिति भी कहते हैं।
और इस मृत्यु ने, सत् और असत् दोनों के इस अभाव ने, कुछ होने का इरादा किया। जो है ही नहीं वह सोच सकता है क्या? यहाँ आकर इन कवियों के भी प्रेरक नासदीय सूक्त के कवि ने एक मुसीबत खड़ी कर दी। पर आरम्भ तो कहीं से होना था। एक चरम बिन्दु पर पहुँचकर हमारे तर्क व्यर्थ तो हो ही जाते हैं। हमारी मोटी बुद्धि हमारा साथ नहीं दे पाती। आइंस्टाइन कहते हैं-समय और आकाश दोनों का अन्त है पर वह इतना विराट है कि इसकी हम कल्पना तक नहीं कर सकते। अन्त है पर नहीं है। ठीक यही भाषा है और नहीं है। और यह भाषा या-तो-यह-या-वह वाली अनिश्चयात्मक भाषा भी नहीं है। सीधा निषेध है। यह भी नहीं और वह भी नहीं। नहीं भी नहीं और नहीं का नहीं भी। न इति, न इति। और इसीलिए ज्ञान का दावा अज्ञान का सूचक और अज्ञान की स्वीकृति ज्ञान का प्रमाण, क्योंकि यहाँ ज्ञान का अर्थ ही अज्ञेयता का बोध है। अतः यह कहना कि मृत्यु के मन में, उस विराट क्षुधा या अशनाया के मन में कुछ बनने का विचार नहीं आ सकता, उतना ही जोखिम भरा है जैसे यह बताना कि यह विचार कैसे और क्यों आया होगा।
हमारी समझ के लिए इतना ही काफी है कि यह विचार आया।
सृष्टि से पहले कुछ नहीं था। अस्तित्व से पहले अस्तित्व का अभाव था। अस्तित्व के अभाव का ही दूसरा नाम है मृत्यु। जब कुछ नहीं था तो मृत्यु ही थी। उस महातिमिर की भाँति जिसे विज्ञानी ब्लैक होल या अन्ध विवर कहते हैं। जो अपने प्रबल गुरुत्व के कारण प्रकाश रश्मियों तक को बाहर निकलने नहीं देता। जो अपने सघन दबाव के कारण परम द्रव को खौलने तक नहीं देता। वह जिसका विस्फोट हो तो वह अपने अदृश्य आकार के हजारों-लाखों गुने दृश्य पिण्डों में बदल जाए। याज्ञवल्क्य और उनके युग के लिए ही नहीं, हमारे आज के साधन सम्पन्न और परमज्ञता का दावा करनेवाले युग के लिए भी वह न इति न इति ही बना रह गया है। सृष्टि का आरम्भ कैसे हुआ? खोज आज भी जारी है जबकि वह आरम्भ समाप्त नहीं हुआ है और वह महासत्ता परम व्योम में आज भी अपना विस्तार करती जा रही है। पिण्ड अज्ञात वेग से फैलते चले जा रहे हैं और साथ ही उस महाकार मुख में समृद्ध वेग हो विनाश के लिए दौड़ते जा रहे हैं। नित्य कितने ब्रह्माण्ड गतायु होकर नष्ट हो रहे हैं, पिण्ड से महाचूर्ण में बदलकर महाव्योम में गुलाल की तरह बिखर जा रहे हैं, इसका कोई हिसाब है। सृष्टि के आदि बिन्दु को लेकर सिद्धान्त बनते हैं पर याज्ञवल्क्य की भाषा में कहें तो उनको आयतन और प्रतिष्ठा नहीं मिल पाती। कुछ समय तक टिके रहते हैं और फिर न इति में बदल जाते हैं। यह भी नहीं। इस व्याख्या का कोई अर्थ है? नहीं, यह भी नहीं। यह तो कहनी भी नहीं है।
याज्ञवल्क्य को लगा कुछ प्रश्नों का उत्तर केवल मौन से ही दिया जा सकता है।