Thursday, February 11, 2016

याज्ञवल्क्य ने जाने कितने छात्रों को, जाने कितनी बार पढ़ाया होगा यह सूक्त। कितनी बार दुहराया होगा वह अर्थ जो उन्होंने अपने गुरु से सुना था। पर आज पहला मन्त्र पढ़ना आरम्भ किया, ‘‘न असत् आसीत् न सत् आसीत् तदानीं’’ कि हठात् रुक गये। शिष्यगण विस्मय से उन्हें देख रहे थे। उनके होठ खुले थे पर न तो उनमें कम्पन था न गति। शायद उन्हें यह बोध भी नहीं रह गया था कि उनके सामने उनके शिष्य भी बैठे हुए हैं। वह इस ऋचा पर नहीं रुके थे। पूरा सूक्त एक काली लौ की तरह उनकी चेतना में एक साथ काँप-सा रहा था। काली लौ। किसी को समझाना चाहें तो कितना कठिन होगा। समझेगा धुएँ या कुहासे की बात कर रहे हैं। पर धुएँ और कुहासे को देखने के लिए भी प्रकाश तो चाहिए। यह तो सघन काले अँधेरे के बीच एक काली शिखा के काँपने की अनुभूति थी जो दृष्टिगम्य नहीं थी पर फिर भी अनुभूतिगम्य थी। अनुभूतिगम्य भी नहीं, बोधगम्य।
सत् नहीं, असत् नहीं, वायु नहीं, आकाश नहीं, कोई दिशा नहीं, कोई गति नहीं, कोई आधार नहीं, मृत्यु नहीं, अमरता नहीं, न रात, न दिन, न प्रकाश, न अन्धकार।
‘‘नहीं, अन्धकार तो था। उबलता हुआ अन्धकार! तरल! अपने में ही छिपा हुआ! अन्धकार तो था।’’ उनके मुँह से निकला पर इस समय भी न तो उन्हें यह बोध था कि उनके शिष्य उनको विस्मय से देख रहे हैं न ही यह कि वह उन्हें पाठ पढ़ाने बैठे थे। वह अपने से आत्मालाप कर रहे थे। आत्मालाप भी नहीं। बोलते हुए सोच रहे थे।
परन्तु इस अन्धकार से पहले। तब, जब अन्धकार भी नहीं रहा होगा। जब कुछ न रहा होगा, तब क्या था? कुछ नहीं के होने को क्या कहेंगे वह? उसे अन्धकार कहना ठीक नहीं लग रहा था और उन्हें उस अवस्था के लिए कोई शब्द मिल नहीं रहा था। सूक्तकार को भी शब्द न मिला होगा। तभी तो अन्धकार कह दिया। भाषा तो उसके रचे हुए संसार को व्यक्त करने का साधन है। उस अरचित, अरूप, अनाकार को कैसे व्यक्त कर पाएगी। और फिर प्रश्न केवल भाषा का था भी नहीं। विकास की उस प्रक्रिया का था जिसका न तो कोई द्रष्टा था, न ज्ञाता। जो केवल अनुमान और ध्यान का विषय था। एक लम्बा समय गुजर गया अपने आप से जूझते। शास्त्रों और श्रुतियों में जो पढ़ा था उसे जोड़ते-मिलाते।
पर तभी, उनकी कल्पना के सामने उपस्थित उस अन्धकार से ही जैसे एक शब्द फूटा, कुछ यूँ कि जैसे अन्धकार ही सिमटकर शब्द बन गया हो, ‘मृत्यु’ उन्हें लगा उन्होंने इस शब्द को सोचा नहीं है, सुना है। एक अस्फुट विस्फोट के रूप में।
‘‘जब कुछ नहीं था तब मृत्यु थी।’’ जैसे कोई समझा रहा हो उन्हें, परम गुरु की भाँति, मृत्यु का कोई रूप या आकार तो है नहीं। अस्तित्व का अभाव ही तो मृत्यु है। रूप का, आकार का, क्रिया का, गति का, किसी का भी न रह जाना। यदि किसी का अस्तित्व था ही नहीं तो वह अन्धकार भी नहीं रहा होगा। मृत्यु ही रही होगी। अन्धकार का भी रूप उसी ने लिया होगा। यदि कोई अपने जन्म से पूर्व की अवस्था को नहीं समझ पाता तो परमेष्ठी कैसे समझ पाते। वह भी अपने पूर्व रूप को समझ न पाये। उस अन्धकार से पहले वह स्वयं मृत्यु रूप ही थे। जीवन और सृजन क्या जो नहीं था उसका हो जाना, जिसका अस्तित्व नहीं था उसका अस्तित्व में आ जाना ही नहीं है।
‘‘सब कुछ मृत्यु से निकला है। मृत्यु ही जीवन का गर्भ है। सृष्टि का मूल।’’ उनके मुँह से निकला। अब वह कुछ आत्मसजग हो गये थे।
शिष्यों पर दृष्टि गयी तो हँसी आ गयी, ‘‘सब कुछ उसी से निकला है। मृत्यु से ही। वही थी। मृत्युना एव इदं आवृतं आसीत्। मृत्यु से ही सब कुछ ढका हुआ था। क्षुधा से ही आवृत था सब कुछ। अशनाया से। अशनाया हि मृत्युः। मृत्यु क्षुधा का ही दूसरा नाम तो है। सब कुछ को निगलती चली जाती है यह। परम क्षुधा। अमिट और अनन्त भूख। इसी का कभी अन्त नहीं होता। सृष्टि से पहले भी यही थी और सृष्टि के बाद भी यही क्रियाशील रहती है। कभी अपने गर्भ में छिपी और कभी अपने को ही उद्घाटित करती। अपने से बाहर आकर अपने को ही ग्रसती।’’
‘‘अनन्त भूख। यही तो मृत्यु की लालसा है। और इसी से सब कुछ पैदा हुआ। मृत्यु की इस लालसा से ही।’’
शिष्य विस्मय में आचार्य को देख रहे थे। याज्ञवल्क्य की आदत है पढ़ाते-पढ़ाते कहीं खो जाने की। पर इस तरह का आत्मालाप और फिर मुखर संवाद वह पहली बार कर रहे थे। शिष्य विस्मय में उन्हें देख रहे थे और जो कुछ उनके शब्दों और भावों से प्रकट हो रहा था उसे ग्रहण करने का प्रयत्न कर रहे थे।
अब वह सचमुच उन्हें समझा रहे थे, ‘‘इस मृत्यु से यह जीवन कैसे निकल आया? हुआ यह कि उस परम मृत्यु के जी में आया कि वह आत्मा से युक्त हो जाए।’’ वह फिर रुक गये। रुककर कुछ सोचने लगे। फिर बोले, ‘‘इसके लिए उसने लम्बे अरसे तक अर्चन किया। अब इससे क या जल उत्पन्न हुआ। यह जल सामान्य जल नहीं था। इसमें द्रव भी था और स्थूल भी, वायु भी और तेज भी। आकाश भी उसी में विद्यमान था और दिशाएँ भी उसी में मिली हुई थीं। यह कारण जल पंचविपाक था। सभी घुलकर द्रव में बदल गये थे। यही वह तरल अन्धकार था। अपने आप में सिमटा हुआ। निगूढ़। घनीभूत। अपने उत्ताप में तपता हुआ, पर अपने ही दबाव में इतना कसा हुआ कि उफनने को भी अवकाश नहीं।
‘‘और फिर इसके अपने ही ताप से इसी का शर या स्थूल भाग एकत्र हो गया। जम गया। यही जमकर पृथ्वी बन गया। यह पृथिवी शर भाग से बनी अतः यही प्रजापति का प्रथम शरीर हुआ। उसका व्यक्त रूप।’’
‘‘फिर?’’ प्रश्न किसी अन्य ने नहीं किया था। उन्होंने अपने आप से किया था। ‘‘क्या हुआ होगा उसके बाद?’’
वह जो तप रहा था उसके स्थूल अंश के अलग हो जाने पर उसके उस ताप का क्या हुआ? उससे अग्नि-रस या द्रवित ऊष्मा अलग हुई वही अग्नि बन गयी। यही प्रजापति ही पहला शरीरी हुआ। पर इसमें बहुत लम्बा समय लगा। बहुत लम्बा।
‘‘फिर इसके बाद?’’
अब याज्ञवल्क्य का चिन्तक कवि में बदल गया। उनके सामने एक विराट रूपक खड़ा हो गया। उस प्रजापति ने अपने को तीन भागों में विभक्त कर दिया। इसका एक तिहाई वायु हो गया। एक तिहाई आदित्य। यह पूर्व दिशा ही उस प्रजापति का सिर है। ईशानी और आग्नेयी दिशाएँ उसकी भुजाएँ हैं। पश्चिम दिशा उसका पुच्छ भाग है और वायव्य व नैऋत्य दिशाएँ उसकी जंघाएँ। दक्षिण और उत्तर दिशाएँ उसके पार्श्व हैं। द्युलोक पृष्ठभाग, अन्तरिक्ष उदर और यह पृथिवी उसका हृदय है। यह अग्नि रूप प्रजापति पहले द्रव रूप में ही था और इसलिए जल में ही उसका निवास था।
परन्तु सृष्टि चक्र यहीं समाप्त तो नहीं हो जाता। बहुत कुछ है इस संसार में। कैसे हो गया वह।
याज्ञवल्क्य आत्मसम्मोहन की अवस्था में पहुँच गये थे।
उसने फिर कामना की कि उसका एक और रूप उत्पन्न हो। उसने वाणी की मिथुन रूप में भावना की और इससे संवत्सर की उत्पत्ति हुई। इससे पहले संवत्सर नहीं था। संवत्सर की जो अवधि है उतने समय तक मृत्यु रूपी प्रजापति ने उसे गर्भ में धारण किये रखा। फिर उसे उत्पन्न किया। उत्पन्न करने के बाद उसने उसका मुँह फाड़ा। उसका मुँह फटते ही उससे भाण् की आवाज निकली। इसी से वाक् की उत्पत्ति हुई। अब उसने उस वाणी और मन के संयोग से ऋक्, साम, यजुर्वेद को, छन्दों को, और ये जो प्रजा और पशु हैं उनको रचा। परन्तु प्रजापति स्वयं ही मृत्यु रूप है अतः उसने जिनको भी रचा उन सभी को खाने का विचार किया। इसीलिए मृत्यु को ही अदिति भी कहते हैं।
और इस मृत्यु ने, सत् और असत् दोनों के इस अभाव ने, कुछ होने का इरादा किया। जो है ही नहीं वह सोच सकता है क्या? यहाँ आकर इन कवियों के भी प्रेरक नासदीय सूक्त के कवि ने एक मुसीबत खड़ी कर दी। पर आरम्भ तो कहीं से होना था। एक चरम बिन्दु पर पहुँचकर हमारे तर्क व्यर्थ तो हो ही जाते हैं। हमारी मोटी बुद्धि हमारा साथ नहीं दे पाती। आइंस्टाइन कहते हैं-समय और आकाश दोनों का अन्त है पर वह इतना विराट है कि इसकी हम कल्पना तक नहीं कर सकते। अन्त है पर नहीं है। ठीक यही भाषा है और नहीं है। और यह भाषा या-तो-यह-या-वह वाली अनिश्चयात्मक भाषा भी नहीं है। सीधा निषेध है। यह भी नहीं और वह भी नहीं। नहीं भी नहीं और नहीं का नहीं भी। न इति, न इति। और इसीलिए ज्ञान का दावा अज्ञान का सूचक और अज्ञान की स्वीकृति ज्ञान का प्रमाण, क्योंकि यहाँ ज्ञान का अर्थ ही अज्ञेयता का बोध है। अतः यह कहना कि मृत्यु के मन में, उस विराट क्षुधा या अशनाया के मन में कुछ बनने का विचार नहीं आ सकता, उतना ही जोखिम भरा है जैसे यह बताना कि यह विचार कैसे और क्यों आया होगा।
हमारी समझ के लिए इतना ही काफी है कि यह विचार आया।
सृष्टि से पहले कुछ नहीं था। अस्तित्व से पहले अस्तित्व का अभाव था। अस्तित्व के अभाव का ही दूसरा नाम है मृत्यु। जब कुछ नहीं था तो मृत्यु ही थी। उस महातिमिर की भाँति जिसे विज्ञानी ब्लैक होल या अन्ध विवर कहते हैं। जो अपने प्रबल गुरुत्व के कारण प्रकाश रश्मियों तक को बाहर निकलने नहीं देता। जो अपने सघन दबाव के कारण परम द्रव को खौलने तक नहीं देता। वह जिसका विस्फोट हो तो वह अपने अदृश्य आकार के हजारों-लाखों गुने दृश्य पिण्डों में बदल जाए। याज्ञवल्क्य और उनके युग के लिए ही नहीं, हमारे आज के साधन सम्पन्न और परमज्ञता का दावा करनेवाले युग के लिए भी वह न इति न इति ही बना रह गया है। सृष्टि का आरम्भ कैसे हुआ? खोज आज भी जारी है जबकि वह आरम्भ समाप्त नहीं हुआ है और वह महासत्ता परम व्योम में आज भी अपना विस्तार करती जा रही है। पिण्ड अज्ञात वेग से फैलते चले जा रहे हैं और साथ ही उस महाकार मुख में समृद्ध वेग हो विनाश के लिए दौड़ते जा रहे हैं। नित्य कितने ब्रह्माण्ड गतायु होकर नष्ट हो रहे हैं, पिण्ड से महाचूर्ण में बदलकर महाव्योम में गुलाल की तरह बिखर जा रहे हैं, इसका कोई हिसाब है। सृष्टि के आदि बिन्दु को लेकर सिद्धान्त बनते हैं पर याज्ञवल्क्य की भाषा में कहें तो उनको आयतन और प्रतिष्ठा नहीं मिल पाती। कुछ समय तक टिके रहते हैं और फिर न इति में बदल जाते हैं। यह भी नहीं। इस व्याख्या का कोई अर्थ है? नहीं, यह भी नहीं। यह तो कहनी भी नहीं है।
याज्ञवल्क्य को लगा कुछ प्रश्नों का उत्तर केवल मौन से ही दिया जा सकता है।

हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।
तुलसीदास ने सुन्दर कांड में जब हनुमान जी ने लंका मे आग लगाई थी तब लिखा है -

हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।

अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास।।

इन उनचास मरुत का क्या अर्थ है यह तुलसी दास जी ने नहीं लिखा पर वाल्मीकि रामायण में इसका सन्दर्भ आता है |

ऋषि कश्यप के दो पत्नियां दिति और अदिति थीं | अदिति से उन्होंने देवताओं को जन्म दिया और दिति से असुरों का जन्म हुआ | देवासुर संग्राम में देवताओं की पराजय के बाद समुद्र मंथन हुआ और उसमे प्राप्त अमृत से देवता अमर हो गए.| देवताओं ने फिर असुरों को पराजित करके उन्हें समाप्त कर दिया |दिति को अपने पुत्रों की मृत्यु से बहुत दुःख और क्रोध हुआ |उन्होंने अपने पति के पास जा कर कहा कि आपके पुत्रों ने मेरे पुत्रों का वध किया है , इस लिए तपस्या करके ऐसे पुत्र को प्राप्त करना चाहती हूँ जो इंद्र का वध कर सके | कश्यप ने कहा कि तुम्हे पहले 1000 वर्षों तक पवित्रता पूर्वक रहना होगा तब तुम मुझसे इंद्र का वध करने में समर्थ पुत्र प्राप्त कर लोगी |यह कह कर कश्यप ने दिति का स्पर्श किया और दिति भी प्रसन्न हो कर अपने पति के कहे अनुसार तप करने चली गयी | दिति को तप करता देख इंद्र भी उनकी सेवा करने लगे | जब तप समाप्ति में 1 वर्ष बाक़ी रहा तप दिति ने इंद्र से कहा कि एक वर्ष बाद जब तुम्हारे भाई का जन्म होगा तब वो तुम्हे मारने मे समर्थ होगा पर तुमने मेरी तप मे इतनी सेवा की है कि मैं उसे तुमको मारने के लिए न कहूंगी |

तुम दोनों मिलकर राज्य करना |इसके बाद दिति को दिन में झपकी आ गयी और उनका सर पैरों मे जा लगा जिससे उनका शरीर अपवित्र हो गया और तप भी भंग हो गया | इधर इंद्र को भी दिति के होने वाले पुत्र से पराजय की चिंता हो गयी थी और उन्होंने इस गर्भ को समाप्त करने का निश्चय किया |इंद्र ने इस गर्भ के 7 टुकड़े कर दिए | दिति के जगने पर जब उन्हें गर्भ के सात टुकड़े होने की बात पता चली तब उन्होंने इंद्र से कहा कि मेरे तप भंग होने के कारण ही मेरे गर्भ के टुकड़े हो गए हैं , इसमे तुम्हारा दोष नही है | दिति ने तब कहा कि टुकड़े होने के बाद भी मेरे गर्भ के ये टुकड़े हमेशा आकाश मे विचरण करेंगे और मरुत नाम से विख्यात होंगे | ये सातों मरुत के सात सात गण होंगे जो सात जगह विचरण कर सकते हैं और इस तरह कुल ४९ मरुत बन जाते हैं |

इन सात मरुतों के नाम हैं -

आवह, प्रवह,संवह ,उद्वह,विवह,परिवह,परावह

इनके सात सात गण निम्न जगह विचरण करते हैं -

ब्रह्मलोक , इन्द्रलोक ,अंतरिक्ष , भूलोक की पूर्व दिशा , भूलोक की पश्चिम दिशा , भूलोक की उत्तर दिशा और भूलोक की दक्षिण दिशा

इस तरह से कुल ४९ मरुत हो जाते हैं जो देव रूप में विचरण करते हैं |

।। ॐ।।

।।  राहू-केतू राश्यांतर एवं फलादेश।।

भक्तजनों,  सादर नमस्कार।

दि. ०९ जानेवारी २०१६, शनिवार को,  प्रात: ०९-१२ बजे राहू महाराज सिंह एवं केतू महाराज कुंभ राशि में प्रवेश कर रहे हैं। उसी राशि में वे देढ वर्ष निवास करेंगे। समुचि धरा का भविष्य तो वे बदल ही देंगे किंतु १२ राशियों के क्या-क्या हो सकता है,  इसका चिंतन करने का प्रयास,  आज, हम,  यहाँ करेंगे।

१. मेष एवं तुला :- विचार एवं संतान का प्रदूषण हो सकता है एवं हठधर्मिता बढ सकती है। किसी भी किस्म की कोई बाधा-पीडा हो सकती है। कुसंगति हो सकती है। अनुचित मार्ग से धनादि लाभ हो सकते हैं। आरोप-अपकिर्ती-अपवाद की संभावना है।

२. वृषभ एवं वृश्चिक :- वास्तु-वाहन की बाधा-पीडा संभव है। माता-पिता संबंधी कष्ट-चिंताएं संभव है। गृहकलह की संभावना है। काम-कारोबार चौपट हो सकता है। काम में वरिष्ठों कष्ट संभव है।

३. मिथुन एवं धनु :- कर्तुत्व प्रभावित-प्रदुषित हो सकता है। बांधव पीडा हो सकती है। दुर्भाग्य हावी हो सकता है। तीर्थाटन कष्टमय हो सकता है।

४. कर्क एवं मकर :- धनसंग्रह-जमापूंजी-वक्तृत्व-पारिवारिक सौख्य प्रभावित हो सकते हैं। आरोग्य-आयुष्य पर संकट संभावना है।

५. सिंह एवं कुंभ :- स्वास्थ्य-व्यक्तित्व कलुषित हो सकता है। पती-पत्नी संबंध में कष्ट-कटुता संभव है। मुकदमों-चुनाओंमें कष्ट-अपयश की संभावनाएं बन रही है। अप्रियता गले पढ सकती है।

६. कन्या एवं मीन :- उदरादि मध्यांतर शरीर में संक्रमण-कष्ट-पीडा संभव है।  मातुल-शत्रु संबंधित कष्ट-पीडा संभव है। ऋण-रोगादि पीडाएं संभव है। विदेश निवास-प्रवास-यात्राएं कष्टप्रद हो सकती हैं । व्यय-हानी-कुनिवेश की संभावनाएं बन रही हैं ।

यह सामान्य फलादेश है। राहू-केतू ग्रह एवं  मेष-तुला, वृषभ-वृश्चिक, मिथुन-धनु, कर्क-मकर, सिंह-कुंभ एवं कन्या-मीन राशियों की सदैव,  स्वाभाविक संमुखता के कारण फल में भी साम्य देखा जा सकता हैं । मूल जन्म लग्न कुंडली की मूल ग्रहस्थिती-बलाबल एवं गोचर ग्रहस्थिती-बलाबल से फल में फर्क देखा जा सकता है।  सटिक फलादेश के लिए समीपस्थ एवं जानकार ज्योतिषी का परामर्श लिया जा सकता है।  अंत राहू-केतू महाराज से इतनी प्रार्थना तो की ही जा सकती हैं कि वे आप के साथ रियायत करें एवं कृपाशिर्वाद प्रदान करें।

बोलिए,  राहू-केतू महाराज कि जय!

।। ॐ।।

।। ॐ।।

।।  राहू-केतू राश्यांतर एवं फलादेश।।

भक्तजनों,  सादर नमस्कार।

दि. ०९ जानेवारी २०१६, शनिवार को,  प्रात: ०९-१२ बजे राहू महाराज सिंह एवं केतू महाराज कुंभ राशि में प्रवेश कर रहे हैं। उसी राशि में वे देढ वर्ष निवास करेंगे। समुचि धरा का भविष्य तो वे बदल ही देंगे किंतु १२ राशियों के क्या-क्या हो सकता है,  इसका चिंतन करने का प्रयास,  आज, हम,  यहाँ करेंगे।

१. मेष एवं तुला :- विचार एवं संतान का प्रदूषण हो सकता है एवं हठधर्मिता बढ सकती है। किसी भी किस्म की कोई बाधा-पीडा हो सकती है। कुसंगति हो सकती है। अनुचित मार्ग से धनादि लाभ हो सकते हैं। आरोप-अपकिर्ती-अपवाद की संभावना है।

२. वृषभ एवं वृश्चिक :- वास्तु-वाहन की बाधा-पीडा संभव है। माता-पिता संबंधी कष्ट-चिंताएं संभव है। गृहकलह की संभावना है। काम-कारोबार चौपट हो सकता है। काम में वरिष्ठों कष्ट संभव है।

३. मिथुन एवं धनु :- कर्तुत्व प्रभावित-प्रदुषित हो सकता है। बांधव पीडा हो सकती है। दुर्भाग्य हावी हो सकता है। तीर्थाटन कष्टमय हो सकता है।

४. कर्क एवं मकर :- धनसंग्रह-जमापूंजी-वक्तृत्व-पारिवारिक सौख्य प्रभावित हो सकते हैं। आरोग्य-आयुष्य पर संकट संभावना है।

५. सिंह एवं कुंभ :- स्वास्थ्य-व्यक्तित्व कलुषित हो सकता है। पती-पत्नी संबंध में कष्ट-कटुता संभव है। मुकदमों-चुनाओंमें कष्ट-अपयश की संभावनाएं बन रही है। अप्रियता गले पढ सकती है।

६. कन्या एवं मीन :- उदरादि मध्यांतर शरीर में संक्रमण-कष्ट-पीडा संभव है।  मातुल-शत्रु संबंधित कष्ट-पीडा संभव है। ऋण-रोगादि पीडाएं संभव है। विदेश निवास-प्रवास-यात्राएं कष्टप्रद हो सकती हैं । व्यय-हानी-कुनिवेश की संभावनाएं बन रही हैं ।

यह सामान्य फलादेश है। राहू-केतू ग्रह एवं  मेष-तुला, वृषभ-वृश्चिक, मिथुन-धनु, कर्क-मकर, सिंह-कुंभ एवं कन्या-मीन राशियों की सदैव,  स्वाभाविक संमुखता के कारण फल में भी साम्य देखा जा सकता हैं । मूल जन्म लग्न कुंडली की मूल ग्रहस्थिती-बलाबल एवं गोचर ग्रहस्थिती-बलाबल से फल में फर्क देखा जा सकता है।  सटिक फलादेश के लिए समीपस्थ एवं जानकार ज्योतिषी का परामर्श लिया जा सकता है।  अंत राहू-केतू महाराज से इतनी प्रार्थना तो की ही जा सकती हैं कि वे आप के साथ रियायत करें एवं कृपाशिर्वाद प्रदान करें।

बोलिए,  राहू-केतू महाराज कि जय!

।। ॐ।।

मुश्किल नहीं है कुछ दुनिया में,
  तू जरा हिम्मत तो कर।
    ख्वाब बदलेंगे हकीकत में,
       तू ज़रा कोशिश तो कर॥
   
आंधियाँ सदा चलती नहीं,
   मुश्किलें सदा रहती नहीं।
      मिलेगी तुझे मंजिल तेरी,
         बस तू ज़रा कोशिश तो कर॥

राह संघर्ष की जो चलता है,
  वो ही संसार को बदलता है ।
     जिसने रातों से जंग जीती है,
        सूर्य बनकर वही निकलता है ।

Monday, January 11, 2016

|| दीक्षायें तीन प्रकार की होती हैं ||



     

दीक्षायें तीन प्रकार की होती हैं ।
१-स्पर्श दीक्षा
२-वैधदीक्षा
३-दृग्दीक्षा
१- स्पर्श दीक्षा –स्पर्शमात्र से जो गुरुजन शिष्य के अन्दर शक्तिपात करते हैं । वह स्पर्शदीक्षा कहलाती है । सीतारामदास
ओंकारनाथ इसी स्तर के महापुरुष थे । जिसकी कुव्डलिनी महाशक्ति का जागरण स्पर्शमात्र से उन्होंने किया था । वे अभी भी जीवित हैं और उनसे मेरा अच्छा सम्बन्ध भी है । पक्षी अपने बच्चों को चारा चुगाने के साथ ही अपने पंखों से
उनको ढकते हुए ऐसा स्पर्श करते हैं कि उन बच्चों का संवर्धन होता है ।
२- वैधदीक्षा – जब कूर्म ( कछवी ) को अण्डा देना होता है तब वह तालाब आदि से निकलकर दूर जाकर मिट्टी खोदकर उसमें अण्डे देकर ढँकने के बाद लौट आती है । तत्पश्चात् निरन्तर चिन्तन करती रहती है कि अब मेरे अण्ड इतने बढ़ गये
होंगे । उसके चिन्तन के प्रभाव से अन्यों में वृद्धि उत्तरोत्तर होती रहती है । एक दिन वह चिन्तन करती है कि अब अण्डों से बच्चे निकलने वाले हैं । वह उस स्थल पर पहुँचकर मिट्टी हटाती है और अपने बच्चों को लेकर चली आती है ।
ऐसे प्रखर मनःशक्तिसम्पन्न गुरुजन स्वप्न आदि अवस्थाओं में शिष्य के समीप पहुँचकर उसे दीक्षित कर देते हैं । ये सब कार्य इनकी संकल्पशक्ति से ही होता है । इनसे किया गया चिन्तन या स्मरणमात्र शिष्य के जीवन में महान् परिवर्तन ला देता है । ये बहुत उच्चकोटि के सिद्ध महापुरुष होते हैं । अभी भी कुछ साधक मेरे सम्बन्ध में हैं जिन पर ऐसे महापुरुषों की कृपा हुई है ।
३- दृग्दीक्षा – कुछ महापुरुष इस कोटि के होते हैं जिनकी दृष्टिमात्र से साधक में महाशक्ति का जागरण हो जाता है । ये अपने संकल्पमात्र से किसी जीव पर कृपा कर सकते हैं । इनका दृष्टिपात साधक को सबल बना देता है । भागवत में मन्दराचल पर्वत से मरे देवताओं को भगवान् ने अपने दृष्टिनिक्षेप से ही जीवित कर दिया-ऐसा वर्णन हैं । ऐसे ही महापुरुषों के विषय में कहा गया है कि वे दर्शन मात्र से पवित्र कर देते हैं–”दर्शनादेव साधवः।।”–भागवतमहापुराण
मछली अपने बच्चों को दुग्धपान तो नहीं कराती । किन्तु क्षुधा से पीड़ित बच्चे जब उसके नेत्रों के सामने आते हैं तब वह अपनी दृष्टि द्वारा ही उनका पोषण करती है ।
ऐसे ही गुरुजनों की कृपादृष्टि में आने पर साधकों का कल्याण होता रहता है ।
आज रोहिणी नक्षत्र युक्त अष्टमी है । इसलिए इसकी जयन्ती संज्ञा हो जाती है । और जन्माष्टमी तो है ही। इसलिए इस दिन व्रत और उपासना का फल द्विगुणित हो जाता है । इसलिए हमें सोल्लास इसे मनाना चाहिए ।
ध्यातव्य है कि जिसकी जन्माष्टमी मना रहे हैं । उन्होंने अपना जीवन गोसेवा से आरम्भ किया । मृत्युलोक ही नहीं अपितु स्वर्गलोक के अधिपति देवराज इन्द्र के कोप से समस्त ब्रज और गौओं की रक्षा की । जिसके कारण उन्हें “गोविन्द” गोपाल कहा जाता है । अतः इस जन्माष्टमी पर हमें उनके आदर्शों पर चलने का दृढ़ संकल्प करना चाहिए कि हम अपनी भारतमाता के साथ ही गोमाता की भी रक्षा करेंगे । और जैसे भगवान् श्रीकृष्ण ने देवराज का दर्प चूर्ण चूर्ण कर दिया था ।
वैसे ही हम देशद्रोहियों गोहत्यारों यवनराज ( आतंकवादी मुल्लों ) का दर्पदलन कर देंगे । तभी हमारे व्रत की सफलता है ।


पं मंगलेश्वर त्रिपाठी
से.1वाशी नवी मुम्बई
8828347830