Monday, January 11, 2016

|| जिनको साईं रंग दिया ,कभी न होय सुरंग ||


      
( ९ ) जिनको साईं रंग दिया ,कभी न होय सुरंग ,
जिन जिन पानी प़ाखरि ,चढ़े सवाया रंग।
जिनको परमात्मा ने अपनी भक्ति के रंग में रंग दिया है अपने नाम की बख्शीश दे दी है वह दोबारा इस संसार की अल्पकालिक अस्थाई मौज मस्ती में नहीं लौटते हैं। इधर उधर के भोग विलास में फिर वह नहीं पड़ते हैं ।परमात्मा के नाम सिमरन की यह जो धारा है उसमें स्नान करने से यह नाम का रंग फिर उतरता नहीं है। और भी सवाया हो जाता है। नाम के स्मरण से वह और भी परमात्मा की तरफ बढ़ता है। ठीक वैसे ही जैसे रंग दिए गए कपड़े  को पानी में डाल देने पर उसमें और  भी निखार आता है।संसार के प्रवाह में भी निकलने से फिर वह भक्ति का रंग कम नहीं होगा ,पक्के रंग की तरह चढ़ जाता है।
  ( १० )ऊंचे पानी न टिके ,नीचे ही ठहराय ,
नीचा होय तो भर पिये ,ऊंचा प्यासा जाय।
पानी का स्वभाव यह है उसे भले मोटर (मशीन) से जितना ऊपर उठा लो वह लौट के नीचे ही आता है। पानी बरसता है पहाड़ों पर वहां  से बरस के फिर वह नीचे आता है ,फिर पृथ्वी में समा जाता है। पानी मनुष्य की विनम्रता का बाना है। अहंकार पर चढ़ा व्यक्ति सुख नहीं पाता है। अहंकार ज्ञान को नष्ट कर देता है जो पानी से भी पतला और तरल होता है। वह सब साधनों को भोग कर भी सुख नहीं पाता है। तृप्त नहीं होता है। प्यासा ही रह जाता है। भगवान् की भक्ति में जो सिर झुकाके जीता है। परमात्मा की भक्ति का जल जिसके हृदय में रुक जाता है वह तृप्त हो जाता है। हृदय ही परमात्मा के नाम का स्थान है। परमात्मा के नाम का जो सुख है वह व्यक्ति अहंकार में रहके प्राप्त नहीं कर सकता। भक्ति का जल हृदय में बसाना पड़ता है। वही जल सुख शान्ति और तृप्ति प्रदान करता है।
( १ १ )आठ पहर चौंसठ घड़ी ,मेरे और न कोय ,
नैना माहिं तू बसे ,नींद को ठौर न होय।
दिन के चार पहर होते हैं और तीन घंटे का एक पहर होता है। इस प्रकार बारह घंटे का दिन होता है। इसीप्रकार रात के भी चार पहर होते हैं। बारह घंटे की ही रात होती है। कुल मिला के  आठ पहर हो गए। एक पहर में आठ घड़ी  और आठ पहर में चौसठ घड़ी हो गईं। सारा काल जो एक दिन और एक रात के बीच में बीतता है वही चौसठ घड़ी कहलाता है। हर नया दिन हमें यह स्मृति दिलाता है अब तुम्हारा नया जन्म हुआ है। सुसुप्ति (रात की नींद में )व्यक्ति सब भूल जाता है। परम शान्ति में होता है। आत्मा जब शरीर से काम लेते लेते थक जाती है तो सो जाती है। हर नए दिन में उठते ही अवलोकन करना चाहिए मैं ने कल क्या किया था। आठ पहर कैसे बिताये  थे।


पं मंगलेश्वर त्रिपाठी
से.1वाशी नवी मुम्बई
8828347830 

|| भगवान की शरणा गति ही उद्धारका सर्बोत्तम उपाय है ||


     

भगवान  की शरणा गति ही उद्धारका सर्बोत्तम उपाय है
उदाहरण =विभिषण
सत्य ही परम धर्म है सत्य के लिये धन ,प्राण ,ऐश्वर्य सभीका सुख पूर्वक त्याग कर देना चाहिये
उदहारण = श्री राम
माता - पिताकी सेवा पुत्रका प्रधान धर्म है
उदाहरण = श्री राम , श्री श्रवणकुमार
जय श्री राम 


पं मंगलेश्वर त्रिपाठी
से.1वाशी नवी मुम्बई
8828347830 

|| ईश्वर की आराधना कब और कैसे? ||



     
॥ ईश्वर की आराधना कब और कैसे? ॥
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं......
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर ।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पुरुषः ॥
(गीता ३/१९)
भावार्थ : "कर्म-फ़ल में आसक्त हुए बिना मनुष्य को अपना कर्तव्य समझ कर कर्म करते रहना चाहिये, क्योंकि अनासक्त भाव से निरन्तर कर्तव्य-कर्म करने से मनुष्य को एक दिन परमात्मा की प्रप्ति हो जाती है।"
"कर्मयोगी" व्यक्ति को सबसे पहले कर्तव्य-कर्म को करना चाहिये, कर्तव्य-कर्म से मुक्त होकर ही किसी भी प्रकार से भगवान की आराधना करनी चाहिये, जो व्यक्ति कर्तव्य कर्म को छोड़कर भगवान की आराधना करते हैं उस व्यक्ति से भगवान कभी प्रसन्न नहीं होते हैं।
"पुराणों के अनुसार जिस-जिस ने भी भगवान को प्राप्त किया केवल अपने कर्तव्य कर्म पर दृड़ रहकर ही प्राप्त किया", कर्तव्य-कर्म को जब अनासक्त भाव से किया जाता है तब कर्तव्य-कर्म ही भगवान की आराधना बन जाता है।
कर्तव्य-कर्म के अतिरिक्त भगवान से जुड़कर जो कुछ भी किया जाता है वह सब भावात्मक रूप से होता है, सबसे पहले कर्तव्य कर्म को ही करना चाहिये, और जब कर्तव्य-कर्म पूर्ण हो जायें तभी भावात्मक रूप से भगवान की आराधना करनी चाहिये, क्योंकि "शास्त्रों के अनुसार भावनात्मक-कर्म से कर्तव्य-कर्म हमेशा श्रेष्ठ होता है"।
जो व्यक्ति हाथ में माला-झोली लेकर चलते रहते है और उसे ही भगवान की भक्ति मान लेते हैं, वह प्रभु की भक्ति नहीं है ऎसे व्यक्ति स्वयं को धोखा ही दे रहें है, यह लोग माला का अर्थ ही नहीं जानते है, जो व्यक्ति माला का वास्तविक अर्थ समझ लेता है वह कभी भी गले में या हाथ में माला-झोली लेकर नहीं चलता है।
माला में जो मोती होते हैं उनको मनका कहा जाता है, मनका का अर्थ होता है मन को स्थिर करने वाला साधन, माला में १०८ मनका होते हैं, माला करते समय हर मनका पर मन की स्थिति का अध्यन करना होता है, जब एक माला पूर्ण हो जाती है तब अध्यन करना होता है कि १०८ बार मन्त्र जपने पर मन कितनी बार भगवान में स्थिर हुआ।
जब निरन्तर माला करते-करते सम्पूर्ण माला पर जिस व्यक्ति का मन पूर्ण स्थिर हो जाता है तब उस व्यक्ति के लिये माला का कोई महत्व नहीं रह जाता है, क्योंकि तब उस व्यक्ति का हर कर्म माला ही बन जाता है।
मन स्थिर केवल एक स्थान पर ही बैठकर हो सकता है, चलते हुए माला करने पर मन कभी स्थिर नहीं हो सकता है, जो व्यक्ति चलते हुए माला करते हैं, उनका मन भगवान में कभी स्थिर नहीं हो सकता है, ऎसे व्यक्ति स्वयं को ही धोखा दे रहे होते हैं।
इसलिये माला एकान्त स्थान में या मन्दिर में ही करनी चाहिये क्योंकि एकान्त में या भगवान की मूर्ति के सामने ही मन स्थिर हो सकता है, चलते-फिरते माला करने वाले समाज की दृष्टि में भले ही भक्त कहलायें और अहंकार से ग्रस्त होकर अपने आप को भले ही भक्त समझने लगे लेकिन भगवान की दृष्टि में तो वह मूढ़ ही होते हैं, ऎसे व्यक्ति कभी भी भगवान की कृपा प्राप्त नहीं कर पाते हैं।
क्योंकि भक्ति का अर्थ प्रभु से प्रेम करना होता है, प्रेम में स्मरण होता है, स्मरण गोपनीय होता है, इसलिये भक्ति को गोपनीय कहा गया है, भक्ति कोई प्रदर्शन की वस्तु नही होती है, इससे समाज भले ही अनुकूल हो जाये लेकिन भगवान तो प्रतिकूल हो जाते हैं।
कुछ व्यक्ति अपने कर्तव्य-कर्म को छोड़कर अपने गुरु का प्रचार करने में लगे रहते हैं, उसे ही आध्यात्मिक उन्नति समझ लेते है, कुछ व्यक्ति आध्यात्मिक किताबों को पढ़कर और उस किताबी ज्ञान को बाँटकर स्वयं को बहुत बडे ज्ञानी समझकर अपने अहंकार को बढाते रहते हैं।
जो व्यक्ति उनकी प्रशंसा करने वाले होते हैं, उन लोगों को वह अपना मित्र समझते हैं, वास्तव में वह उनके सबसे बड़े दुश्मन होते हैं क्योंकि वह उनकी अहंकार रूप अग्नि को हवा देते रहते हैं और वह उनकी प्रशंसा से स्वयं को ज्ञानी समझने लगते हैं, ऎसे व्यक्ति कभी भी आध्यात्मिक उन्नति नहीं कर पाते हैं।
ज्ञान बाँटने का अधिकारी केवल वही होता है जिसमें ज्ञान स्वयं प्रकट होता है, या जो गुरु परम्परा से गुरु पद पर आसीन होता है, हर व्यक्ति को स्वयं को पहचानने का प्रयास करना चाहिये कि क्या उसमें वास्तविक ज्ञान स्वयं प्रकट हुआ है कि नहीं, यदि ज्ञान प्रकट नहीं हुआ है तब तक प्रत्येक व्यक्ति आध्यात्मिक स्तर पर अज्ञानी ही होता है।
उस व्यक्ति को शिष्य अवस्था पर ही स्थित रहना चाहिये, शिष्य का एक ही धर्म हैं सुनकर या पढ़कर जहाँ से भी ज्ञान प्राप्त हो उसे ग्रहण करके आत्मसात करने का प्रयत्न करना चाहिये, ऎसा करने से एक दिन ज्ञान स्वयं प्रकट होने लगेगा तब वह व्यक्ति ज्ञान बाँटने का अधिकारी हो जाता है।
शिष्य स्तर पर स्थित व्यक्ति को कभी भी आध्यात्मिक ज्ञान चर्चा सार्वजनिक स्थान पर नहीं करनी चाहिये, ऎसे व्यक्ति न तो आध्यात्मिक उन्नति कर पाते हैं और न ही भौतिक उन्नति कर पाते हैं, गुरु बनकर कभी भी ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता है, जो अच्छा शिष्य होता है वही एक दिन अच्छा गुरु स्वत: ही बन जाता है।
॥ हरि: ॐ तत्सत् ॥


पं मंगलेश्वर त्रिपाठी
से.1वाशी नवी मुम्बई
8828347830 

|| हरि: ॐ तत्सत् सर्वेभ्यो नमो नम: सुप्रभातम् ||


     
हरि: ॐ तत्सत् सर्वेभ्यो नमो नम: सुप्रभातम्
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जय श्री कृष्णा। शेयर भी अवश्य करें ताकि ये जानकारी सभी लोगों तक पहुंचे।।
कुछ बातें बार बार हिन्दुओं को गलत दिखाने के लिए की जाती है
आज का प्रश्न:- वेद में लिखा है कि “न तस्य प्रतिमा अस्ति” जब वेदों में मूर्ती पूजा मना है तो फिर क्यों आप लोग मूर्ती पूजा करते हो? जबकि सनातन में वेद को बहुत बड़ा स्थान दिया है तो फिर वेदों का उलंघन क्यों करते हो? वेदों का उलंघन करके क्या कोई सनातनी रह कैसे सकता है?
मित्रों पहले तो ये समझो कि किसी को भी कुछ भी गलत कह देना ये आपकी गलत और तुच्छ सोच का प्रमाण देती है।।
मेरी राय आपको इतनी है कि कभी भी सुनी बातों से ज्यादा खुद भी पढ़ लिया करें।। आपको शर्म आनी चाहिए हमेशा एक छोटी सी लाइन ही लेकर आ जाते हैं उनको या तो पूरे पाठ पढ़ लेना चाहिए या हो सके तो कम से कम पूरे श्लोक का तो अर्थ जान ही लेना चाहिए।।
एक कहावत तो सुनी ही होगी कि अधूरा ज्ञान अज्ञान का ही दूसरा रूप है।।
पूरा श्लोक है ये।।
‘यस्य नाम महाद्यश:। हिरण्यगर्भस इत्येष मा मा हिंसीदित्येषा यस्मान जात: इत्येष:।।’- यजुर्वेद ३२वां अध्याय श्लोक ३
न तस्य प्रतिमा अस्ति= प्रतिमा शब्द का अर्थ आकर से भी होता है, और वो अनेकों तत्वों और द्रव्यों का समूह है, जैसे मिटटी, पानी या अन्य धातु या द्रव्य या तत्वों का कोई एक रूप आकर प्रतिमा नहीं उसी प्रकार ये भी सीमित आकर में नहीं है।।
यस्य नाम महाद्यश:= उसका नाम ही महाद्रश्य है उसकी तुलना में कोई नहीं अग्निल वही है, आदित्यह वही है, वायु, चंद्र और शुक्र वही है, जल, प्रजापति और सर्वत्र भी वही है, ये सभी का समूह है।न तस्य प्रतिमा अस्ति= प्रतिमा शब्द का अर्थ आकर से भी होता है, और वो अनेकों तत्वों और द्रव्यों का समूह है, जैसे मिटटी, पानी या अन्य धातु या द्रव्य या तत्वों का कोई एक रूप आकर प्रतिमा नहीं उसी प्रकार ये भी सीमित आकर में नहीं है।।
हिरण्यगर्भस इत्येष मा मा= उस परमात्मा की पूजा इसके ब्रम्हांड(गर्भ) से जन्मे हुओं द्वारा आदि आदि मन्त्रों और कार्यों से की जाती है।।
हिंसीदित्येषा यस्मान जात: इत्येष:= इसके विपरीत इसी के गर्भ से जन्मे दैत्य आदि भी उतनी ही हिंसा आदि किया करते हैं।।
इस श्लोक के संशय से क्या स्पष्ट होता है समझदार के लिए काफी है, और जिनके लिए काफी नहीं है उनके लिए उदहारण भी दे देते हैं समझने में आसानी होगी।।
उदहारण:- सभी एक ही से पैदा हैं और हम उस परब्रम्हं के आगे कुछ भी नहीं हैं ये तो समझ में आ गया होगा, और हमें सदैव उसका ही अनुसरण करना चाहिए।।
लेकिन इसमें कोई बंधन नहीं है।।
अगर कुछ लोग रोज़ सुबह मन्त्र जाप नहीं कर सकते तो सुबह सुबह मंदिर में जाकर ध्यान-पूजा भी करते हैं,
जो रोज़ मंदिर नहीं जा सकते वो कभी कभी भी मंदिर जाकर पूजा करते हैं,
जो मंदिर नहीं जा पाते लेकिन सदैव ईश्वर के लिए उनके ध्यान-पूजा में रहना चाहते हैं तो कुछ लोग अपने घरों में भी मूर्ती की ध्यान-पूजा करते हैं,
कुछ लोग मूर्ती नहीं पूजते लेकिन फिर भी समय समय पर ईश्वर का ध्यान करते हैं,
कुछ लोग संन्यास लेकर ईश्वर का ध्यान-पूजा करते हैं तो कुछ गृहस्थ जीवन में रहकर भी ईश्वर का ध्यान-पूजा करते हैं,
सनातन में सभी लोग अनेक अनेक प्रकार से ईश्वर का ध्यान-पूजा करते हैं।।
और बाकी धर्मों में भी कोई बंधन नहीं होता है बल्कि जैसा आप चाहे आप ईश्वर का ध्यान-पूजा करते हैं बस इसके लिए ध्यान और पूजा दोनों आवश्यक हैं क्योंकि अगर आपका ध्यान कहीं और है तो आपकी पूजा नहीं होती बल्कि केवल आडम्बर ही होता है।। जो आज के समय में बहुत से लोग मिल जायेंगे जो मंदिर जाते हैं ईश्वर के आगे हाथ जोड़ते हैं और फिर भी उनका ध्यान बाकी दूसरी बातों में रहता है तो इसको नादानी में माफ़ किया जा सकता है अपितु इसके विपरीत किसी की नियत में खोट है और वो जानबूझकर मंदिर में जाकर आडम्बर करता है और अपने किसी अन्य गलत नियत से मंदिर में जाकर कुछ गलत करता है तो वह माफ़ नहीं हो सकती।।
मुस्लिमों में नमाज को पांच समय के लिए बताया गया है।।
जैसे मक्का एक है और उसकी तरफ मुंह करके नमाज होती है।। मदीना भी इसीलिए मस्जिद बनायीं गयी तो क्या जो मक्का या मदीना नहीं जा पाता वो नमाज नहीं पढता??? पढता है।।
कभी मस्जिद ना मिले और वो सफ़र में हो तो वह रास्ते में भी नमाज पढ़ सकता है तो ये कैसे जानेगा कि मक्का किस तरफ है। फिर भी नमाज मानी जाती है।।
कोई पांच बार नमाज ना पढ़ पाए तो भी उसको एक बार नमाज पढके मुसलमान कहा जाता है।।
कोई दिन में एक बार भी ना पढ़ पाए तो हर जुमा को नमाज पढ़ सकता है।।
तो ये कोई बंधन नहीं है।।
वेदों के लिए ब्रम्हा ने भी तप किया उसके बाद ही प्राप्त हुए।।
ये कोई साधारण नहीं है कि कोई भी कुछ भी कहे जो गलत करेगा उसको उसकी सज़ा मिलेगी अगर इसके विपरीत वह मानव धर्म में श्रेष्ठ है और उसके कर्म से पुन्य इस पाप से अधिक हों तो माफ़ भी है कि उसकी नासमझी थी जो इसको ना समझ सका परन्तु उसने अपने जीवन का सही उपयोग किया और मानवधर्म का नियतरूप से पालन किया।।
मन्त्रों का गलत अर्थ निकाल कर सनातन को बदनाम करना बंद करें।।
क्योंकि जो सत्य है वो ही शाश्वत है।। झूठी शान और नाम या व्यक्ति या वस्तु सदैव नहीं रहती उसका नाश अवश्य होता है, और सनातन सर्वथा सत्य था सर्वथा है और सर्वथा रहेगा।।
अतिरिक्त जानकारी “यस्मान जात:” (यजुर्वेद ८/३६) में परमात्मा को १६ कलाओं से युक्त बताया गया है।। जो श्री कृष्ण जी को दर्शाती है।। “हिरण्यगर्भ” (यजुर्वेद २५/१०) में मनुष्य शरीर की आत्मा को दर्शाया गया है।। “मा मा” (यजुर्वेद १२/१०२) में आदिपुरूष जगदीश्वर की उपासना की गई है” मंत्र का तात्पर्य ये है की “आत्मा का कोई प्रतिमान नही होता।। ” फिर कुछ लोग इस मंत्र को मूर्ति-पूजा के विरुद्ध क्यों इस्तेमाल करते हैं जबकि इसका अर्थ “आत्मा” से संबंधित है।।
जय श्री राम


पं मंगलेश्वर त्रिपाठी
से.1वाशी नवी मुम्बई
8828347830 


😊🌻😊🌻😊🌻😊
स्वागत! जीवन के नवल वर्ष 
आओ, नूतन-निर्माण लिये, 
इस महा जागरण के युग में 
जाग्रत जीवन अभिमान लिये; 

दीनों दुखियों का त्राण लिये 
मानवता का कल्याण लिये, 
स्वागत! नवयुग के नवल वर्ष! 
तुम आओ स्वर्ण-विहान लिये। 

संसार क्षितिज पर महाक्रान्ति 
की ज्वालाओं के गान लिये, 
मेरे भारत के लिये नई 
प्रेरणा नया उत्थान लिये; 

मुर्दा शरीर में नये प्राण 
प्राणों में नव अरमान लिये, 
स्वागत!स्वागत! मेरे आगत! 
तुम आओ स्वर्ण विहान लिये! 

युग-युग तक पिसते आये 
कृषकों को जीवन-दान लिये, 
कंकाल-मात्र रह गये शेष 
मजदूरों का नव त्राण लिये; 

श्रमिकों का नव संगठन लिये, 
पददलितों का उत्थान लिये; 
स्वागत!स्वागत! मेरे आगत! 
तुम आओ स्वर्ण विहान लिये! 

सत्ताधारी साम्राज्यवाद के 
मद का चिर-अवसान लिये, 
दुर्बल को अभयदान, 
भूखे को रोटी का सामान लिये; 

जीवन में नूतन क्रान्ति 
क्रान्ति में नये-नये बलिदान लिये, 
स्वागत! जीवन के नवल वर्ष 
आओ, तुम स्वर्ण विहान लिये!
🌻🌷🌻🌷🌻🌷🌻
नव वर्ष मंगलमय हो
😊🙏😊
पं मंगलेश्वर त्रिपाठी

Wednesday, December 30, 2015

हरिः ॐ तत्सत्!  शुभरात्रि। सर्वेभ्यो भक्तेभ्यो देवभाषारसरसिकेभ्यश्च नमो नमः।🌺🙏🌺

💥विवेक-विचार💥
भगवत्कृपा का फल संत-महापुरुषों का दर्शन।

सन्त-महापुरुषों के दर्शन का फल भगवद्दर्शन।

सन्त का कोई भेष-वर्ण नहीं होता है, अपितु  उनका सहज पवित्रविचार और परमार्थिकव्यवहार ही उनके सन्तत्व के वैशिष्ट्य का प्रतिपादन करता है।
विभिन्‍न मतावलम्बियों के चिह्न-वस्त्रादि होते हैं। चारों आश्रम में सन्त-महापुरुषों का दर्शन हुआ है, हो रहा है और आगे भी होगा।
सन्त-महापुरुषों का स्वभाव सदा परमार्थिक और राष्ट्रीयप्रेम से अोत-प्रोत रहता है। पूज्यपाद डोंगरे महाराज जी कहते थे चमत्कार तो जादूगर (मायावी) दिखाता है। उपदेशक और शिक्षक का श्रृंगार उनका ज्ञान और सदाचारण है। स्वच्छता अनिवार्य है, किन्तु कृत्रिम साधनों से अपने आप को सजाना-सँवाराना केवल धन और समय का अपव्यय करना है।
💥जो किसी रंगमञ्च के कलाकार हैं अथवा जिन्हें शास्त्र ने अनुमति दी है, वे लोग करें तो करें।
कुछ तथाकथित लोग सनातनधर्म की मर्यादा और उसके मानबिन्दुअों का जानबूझ कर उल्लंघन कर रहें हैं, उनसे हम सब सावधान रहें तथा दूसरे सनातनियों को भी सुरक्षित करें।
🌺सत्य सनातन धर्म की जय🌺

शिवपुराण में कहा गया है कि साकार और निराकार दोनों ही रूप में शिव की पूजा कल्याणकारी होती है, लेकिन शिवलिंग की पूजा करना अधिक उत्तम है। साकार रूप में शिव हाथ में त्रिशूल, डमरू लिए और बाघ की छाल पहने नज़र आते हैं। जबकि महादेव के अतिरिक्त अन्य कोई भी देवता साक्षात् ब्रह्मस्वरूप नहीं हैं। संसार भगवान शिव के ब्रह्मस्वरूप को जान सके इसलिए ही भगवान शिव ज्योर्तिलिंग के रूप में प्रकट हुए और लिंग के रूप में इनकी पूजा होती है। माना जाता है कि शिवलिंग की पूजा करके जो भक्त शिव को प्रसन्न करना चाहते हैं, उन्हें सुबह से लेकर दोपहर से पहले ही इनकी पूजा कर लेनी चाहिए। इस दौरान शिवलिंग की पूजा विशेष फलदायी होती है।
शिवलिंग का महत्व
शिवलिंग जो कि भगवान शंकर का प्रतीक है। उनके निश्छल ज्ञान और तेज का यह प्रतिनिधित्व करता है। 'शिव' का अर्थ है - 'कल्याणकारी'। 'लिंग' का अर्थ है - 'सृजन'। सृजनहार के रूप में उत्पादक शक्ति के चिन्ह के रूप में लिंग की पूजा होती है। स्कंद पुराण में भी लिंग का अर्थ लय लगाया गया है। लय ( प्रलय) के समय अग्नि में सब भस्म हो कर शिवलिंग में समा जाता है और सृष्टि के आदि में लिंग से सब प्रकट होता है। लिंग के मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु और ऊपर प्रणवाख्य महादेव स्थित हैं।
पौराणिक कथा के अनुसार
दक्ष प्रजापति ने अपने यज्ञ में शिव जी का भाग नहीं रखा, जिससे गुस्से में आकर जगजननी सती दक्ष के यज्ञ मण्डप में योगाग्नि से जल कर भस्म हो गई। सती के शरीर त्याग की खबर मिलते ही ही भगवान शिव बहुत गुस्से में आ गए। वे नग्न हो कर पृथ्वी में भ्रमण करने लगे। एक दिन वह उसी अवस्था में ब्राह्मणों की बस्ती में पहुंच गए। शिव जी को उस अवस्था में देख कर वहां की स्त्रियां मोहित हो गई। यह देख कर ब्राह्मणों ने भगवान भोलेनाथ को शाप दे दिया कि उनका लिंग तत्काल शरीर से अलग हो कर भूमि पर गिर जाए। ब्राह्मणों के शाप के प्रभाव से शिव का लिंग उनके शरीर से अलग होकर गिर गया, जिससे तीनों लोकों में हाहाकार होने लगा। सभी देव, ऋषि, मुनि व्याकुल हो कर ब्रह्मा की शरण में गए।
ब्रह्मा ने योगबल से शिवलिंग के अलग होने का कारण जान लिया और वह समस्त देवताओं, ऋषियों और मुनियों को अपने साथ लेकर शिव जी के पास पहुंचे। ब्रह्मा ने शिव जी की स्तुति की और उन्हें प्रसन्न करते हुए उनसे लिंग धारण करने का निवेदन किया। तब भगवान शिव ने कहा कि आज से सभी लोग मेरे लिंग की पूजा प्रारम्भ कर दें तो मैं पुन: उसे धारण कर लूंगा। भगवान भोलेनाथ की बात सुनकर ब्रह्मा जी ने सर्वप्रथम स्वर्ण का शिवलिंग बना कर उसकी पूजा की। उसके बाद देवताओं, ऋषियों और मुनियों ने अनेक द्रव्यों के शिवलिंग बनाकर पूजन किया। तभी से शिवलिंग की पूजा आरम्भ हो गई।