Thursday, October 1, 2015

||अहंकार का पुतला||

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अहंकार का पुतला मनुष्य प्रभु की इच्छा को उनकी आज्ञा को स्वीकार नहीं करता और अपने ही निर्बल कन्धों पर अपना बोझ उठाये फिरता है। इतना ही नहीं दुनिया का भार उठाने का दम भरता है । यही कारण है कि निराशा, चिन्ताएँ, दु:ख, रोग, असफलतायें उसे घेरे हुए हैं और रात दिन व्याकुल सा सिर धुनता हुआ मनुष्य अत्यन्त परेशान सा दिखाई देता है ।
जो चैतन्य सत्ता इस स्थूल संसार का धारण पोषण कर रही है, जो आत्म स्वरुप में सब में व्याप्त हैं, वह प्रेम ही है । व्यष्टि और समष्टि में आत्मा का वह प्रेम प्रकाश ही ईश्वर की मंगलमयी रचना का सन्देश दे रहा है । जब मनुष्य आत्मा के उस प्रेम प्रकाश का अवम्बलन लेता है तभी वह संसार को आनन्द और सुखों का घर मानने लगता है और तभी उसे सच्चा सुख मिलता है । प्रेम ही आत्मा का प्रकाश है । जो इस प्रकाश में जीवन पथ पर अग्रसर होता है, उसे संसार शूल नहीं फूल नजर आता है, दु:खों का घर नहीं वरन् स्वर्ग मालूम होता है ।
अहंकार वश प्रभु की इच्छा के विपरीत चलकर कभी सुख शान्ति मिल सकती है ? नहीं कदापि नहीं । हमें अपने हृदय मन्दिर में से अहंकार, वासना, राग-द्वेष को निकालकर रिक्त करना होगा और ईश्वरेच्छा को सहज रुप में काम करने देना होगा तभी जीवन यात्रा सफल हो सकेगी

अहंकार की सीमाओं में प्रेम बदरिया नहीं बरसती
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अहंकार की सीमाओं में प्रेम बदरिया नहीं बरसती
भेद भावना की बस्ती में ज्योति ज्ञान की नहीं सुलगती |

चुभे नहीं कांटे जिस ऊँगली में वो परपीड़ा नहीं समझती
नाम नयन सुख रख देने से अंधी आँखें नहीं सुधरती |

अधजल गगरी जितना थामो छलक छलक गिर जाती है
ज्वाला एक दिन क्रोध की अपने ही घर लग जाती है |

काजल को कितना भी धो दो उसकी रंगत नहीं निखरती
नाम नयन सुख रख देने से अंधी आँखें नहीं सुधरती |

टेढ़ी लकड़ी को सब केवल आग लगाकर ही तपते हैं
बंजर जंगल में केवल जहरीले विचरण करते हैं |

गोभी के फूलों की खुसबू उपवन में नहीं बिखरती
नाम नयन सुख रख देने से अंधी आँखें नहीं सुधरती |

तिल का ताड़ बनाने वाले बीमारी के पंजर केवल
बगिया को बंजर करते हैं बिगड़े हुए जानवर केवल |

पेड़ खजूर तले इन्सां को छावं कभी भी नहीं पसरती
नाम नयन सुख रख देने से अंधी आँखें नहीं सुधरती |


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पं मंगलेश्वर त्रिपाठी
से.1वाशी नवी मुम्बई
  8828347830  

|| शास्ता अष्टकम् ||


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हरिवरासनं विश्वंमोहनं
हरितदीश्वराऽऽराध्यपादुकम् ।
अरिविमर्द्दनं नित्यनर्तनं
हरिहरात्मजं देवमाश्राये॥ १ ॥
चरणकीर्तनं शक्तमानसं
भरणलोलुपं नर्तनालयम् ।
अरुणभासुरं भूतनायकं
हरिहरात्मजं  देवमाश्राये  ॥ २ ॥
प्रणय सत्यका प्राणनायकं
प्रणतकल्पकं सुप्रभाञ्चितं ।
प्रणवमन्दिरं कीर्तनप्रियं
हरिहरात्मजं  देवमाश्राये ॥ ३ ॥
तुरगवाहनं सुन्दराननं
वरगदायुधं देववर्णितम् ।
गुरुकृपाकरं कीर्तनप्रियं
हरिहरात्मजं  देवमाश्राये ॥ ४ ॥
त्रिभुवनार्चितं देवतात्मकं
त्रिनयनप्रभुं दिव्यदेशिकम् ।
त्रिदशपूजितं चिन्तितप्रदं
हरिहरात्मजं  देवमाश्राये  ॥ ५ ॥
भवभयापहं भावुकावहं
भुवनमोहनं भूतिभूषणम् ।
धवलवाहनं दिव्यवारणं
हरिहरात्मजं  देवमाश्राये  ॥ ६ ॥
कलमृदुस्मितं सुन्दराननं
कलभकोमलं गात्रमोहनम् ।
कलभकेसरीवाजिवाहनं
हरिहरात्मजं  देवमाश्राये  ॥ ७ ॥
श्रितजनप्रियं चिन्तितप्रदं
श्रुतिविभूषणं साधुजीवनम् ।
श्रुतिमनोहरं गीतलालसं
हरिहरात्मजं  देवमाश्राये  ॥ ८ ॥
    –जय श्रीमन्नारायण।
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पं मंगलेश्वर त्रिपाठी
से.1वाशी नवी मुम्बई
  8828347830  



||समस्यपूर्तिः||

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भोजनान्ते च किं पथ्यं?
जयन्तः कस्य वै सुतः?
कथं विष्णुपदं प्रोक्तं?
तक्रं शक्रस्य दुर्लभम् ॥
पदच्छेदः –
भोजनान्ते च किम् पथ्यम्? जयन्तः कस्य वै सुतः?
कथम् विष्णुपदम् प्रोक्तम्? तक्रम् शक्रस्य दुर्लभम् ॥
अन्वयः –
भोजनान्ते किं पथ्यम्? तक्रम् । जयन्तः कस्य सुतः? शक्रस्य । विष्णुपदं कथं प्रोक्तम्? दुर्लभम् वै ।
अन्वयार्थः –
भोजनान्ते
किं
पथ्यम्?
तक्रम्

जयन्तः
कस्य
सुतः?
शक्रस्य

विष्णुपदं
कथं
प्रोक्तम्?
वै
दुर्लभम् ।
भावार्थः –
इयं समस्यापूर्तिः । श्लोकस्य चतुर्थपादे ‘तक्रं शक्रस्य दुर्लभम्’ (देवराजः इन्द्रः तक्रं न लभते) इति अस्ति । श्लोकस्य आदौ त्रयः प्रश्नाः सन्ति, तेषां क्रमशः अन्तिमपादे उत्तरम् अस्ति । तद्यथा,
प्रथमः प्रश्नः - भोजनान्ते किं पथ्यम्? उत्तरम् - तक्रम् ।
द्वितीयः प्रश्नः - जयन्तः कस्य सुतः? उत्तरम् - शक्रस्य = इन्द्रस्य।
तृतीयः प्रश्नः - विष्णुपदं कीदृशम् इति वर्ण्यते?उत्तरम् -  निश्चयेन दुर्लभम्।
–जय श्रीमन्नारायण।

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पं मंगलेश्वर त्रिपाठी
से.1वाशी नवी मुम्बई
  8828347830